एक साल बाद भी अधूरी ‘राम वनगमन पथ’ परियोजनासीतारपटन को अब तक नहीं मिला धार्मिक दर्जा, लोगों में फूटा गुस्सा

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। मध्यप्रदेश सरकार की बहुप्रचारित ‘राम वनगमन पथ’ परियोजना एक साल बाद भी ज़मीनी हकीकत में नहीं उतर पाई है। पिछले वर्ष राज्य मंत्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने मंडला में आयोजित पत्रकार वार्ता में स्पष्ट घोषणा की थी कि लव-कुश की जन्मस्थली सीतारपटन को इस परियोजना में शामिल किया जाएगा, लेकिन आज तक न तो कोई निर्माण कार्य शुरू हुआ और न ही इसे धार्मिक स्थल का दर्जा मिला।


वही घोषणाएं सिर्फ़ कागज़ों में सिमट कर रह गई हैं, जबकि हकीकत में सीतारपटन आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।


आस्था का केंद्र, फिर भी उपेक्षित
वही सीतारपटन जिला मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर दूर अंजनिया के पास सुरपन नदी के तट पर स्थित है। जनश्रुतियों के अनुसार यह स्थल लव-कुश की जन्मस्थली माना जाता है और यहीं महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। यहां मौजूद “पत्थरों के नगाड़े” और रहस्यमयी “अनजान पेड़” आज भी श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बावजूद इसके, विकास के नाम पर यहां सिर्फ़ उपेक्षा ही नजर आती है।


लोगो में फूटा लोगों का गुस्सा
हाल ही में स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का आक्रोश खुलकर सामने आया। लोगों ने साफ कहा — “सरकार ने वादा तो किया, लेकिन निभाया नहीं।”
श्रद्धालुओं का आरोप है कि धार्मिक भावनाओं के नाम पर सिर्फ़ घोषणाएं की गईं, लेकिन धरातल पर कोई काम नहीं हुआ। जनप्रतिनिधियों ने भी उठाए सवाल


पूर्व विधायक डॉ. शिवराज शाह और जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. संजय कुशराम ने भी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने सहस्त्रधारा और कालपी को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग दोहराते हुए कहा कि बार-बार आग्रह के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
बड़ा सवाल: आस्था बनाम राजनीति?


ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि अगर सरकार जल्द ही राम वनगमन पथ परियोजना पर काम शुरू नहीं करती, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।


अब सवाल यह है कि
क्या ‘राम वनगमन पथ’ सिर्फ़ घोषणाओं तक सीमित रहेगा, या सीतारपटन को उसका हक़ मिलेगा?

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