दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला।
एक ओर सरकार “हर घर नल, हर घर जल” का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर मंडला जिले के घुघरी तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत छिवलाटोला के ग्रामीण भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए प्रतिदिन दो से तीन किलोमीटर दूर भटकना पड़ रहा है। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को साइकिल, ऑटो और अन्य साधनों से पानी ढोकर अपनी प्यास बुझानी पड़ रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि जल संकट को लेकर कई बार पंचायत, संबंधित विभाग और जनसुनवाई में शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। हर बार केवल आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाता है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि गांव में पेयजल व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
करोड़ों की योजनाएं, लेकिन पानी नहीं
केंद्र और राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से नल-जल योजनाएं संचालित की जा रही हैं। लेकिन छिवलाटोला जैसे गांवों की स्थिति इन योजनाओं की पोल खोल रही है। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जब योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं तो लोगों को पानी के लिए दर-दर क्यों भटकना पड़ रहा है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जल निगम के अधिकारी, कर्मचारी और ठेकेदारों की लापरवाही तथा मनमानी के कारण योजनाएं धरातल पर सफल नहीं हो पा रही हैं। कई जगह पाइप लाइनें अधूरी हैं, कहीं मोटरें खराब पड़ी हैं तो कहीं जल स्रोतों का रखरखाव नहीं किया जा रहा है। नतीजा यह है कि जनता को योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा।
जनसुनवाई भी बनी औपचारिकता
ग्रामीणों का कहना है कि आज पुनः जनसुनवाई में शिकायत दर्ज कराई गई है, लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए उन्हें समाधान की उम्मीद कम ही दिखाई दे रही है। उनका आरोप है कि जनसुनवाई केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह गई है, जहां शिकायतें तो ली जाती हैं लेकिन उनका निराकरण नहीं होता।
जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए अरबों रुपये खर्च कर रही है तो फिर ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट की जिम्मेदारी किसकी है? क्या जल निगम के अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? क्या ठेकेदारों द्वारा किए गए कार्यों की गुणवत्ता की जांच होगी? या फिर जनता इसी तरह पानी के लिए परेशान होती रहेगी?
आंदोलन की चेतावनी
लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पेयजल व्यवस्था बहाल नहीं की गई और दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे। ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें आश्वासन नहीं, बल्कि पानी चाहिए।
छिवलाटोला की तस्वीर एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर “हर घर जल” का सपना कब हकीकत बनेगा? और कब तक ग्रामीणों को अपने ही अधिकार के पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?
