हफ्तों बीते, स्कूल खुले, पर अतिथि शिक्षक भर्ती नहीं

Revanchal
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शिक्षा विभाग का आदेश जारी, ट्राइबल स्कूलों में भर्ती अटकी
मंडला, पी.डी.खैरवार (अतिथि शिक्षक परिवार जिला अध्यक्ष)

दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। शिक्षा सत्र अप्रैल 2026 से शुरू हो चुका है। 17 जून से स्कूल खुल गए, 21 जून से बच्चे भी बुलाए जा रहे हैं। पर जिले के सैकड़ों शिक्षक-विहीन और शिक्षकों की कमी से जूझते आ रहे स्कूलों में पढ़ाने वाला कोई नहीं है। बच्चे स्कूल आते हैं, खेलते-कूदते हैं, मिडिल तक के बच्चे मध्यान्ह भोजन करते हैं, और शाम 4:30 बजे घर लौट जाते हैं – बिना पढ़ाई के।

डीपीआई का आदेश 30 जून को जारी हो चुका है। इस आदेश के अनुसार शिक्षा विभाग के प्राचार्य अतिथि शिक्षकों की भर्ती शुरू कर चुके हैं। पर ट्राइबल डिपार्टमेंट के स्कूलों में भर्ती अटकी पड़ी है।

ट्राइबल स्कूलों के प्राचार्यों का तर्क है – “डीपीआई का आदेश हमारे लिए मान्य नहीं। ट्राइबल विभाग का अलग आदेश चाहिए। बिना उसके भर्ती की तो अतिथि शिक्षकों का मानदेय फंस जाएगा।”

सवाल ये है – स्कूल तो स्कूल हैं, चाहे शिक्षा विभाग का हो या ट्राइबल का। जब लोक शिक्षण के बाकी सभी आदेश ट्राइबल स्कूलों पर लागू होते हैं, तो अतिथि भर्ती पर अलग आदेश का इंतजार क्यों?

नतीजा: गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों की पढ़ाई चौपट। 1 जुलाई से बच्चों की उपस्थिति बढ़ रही है, पर अधिकतर स्कूलों में पढ़ाने वाला कोई नहीं। ना कोई पाठ पढ़ाता है, ना गृहकार्य देता है। जिससे बच्चों को भी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ रहा है।भवन और बुनियादी सुविधाओं की कमी से वैसे भी जूझते आ रहे सरकारी स्कूलों में ये लापरवाही आग में घी का काम कर रही है। वहीं पर वर्षों से अत्यंत कम मानदेय पर आंशिक रोजगार में लगे अतिथि शिक्षकों को भी मानदेय का घाटा उठाना पड़ रहा है।

मांग: शासन तत्काल संज्ञान ले। भेदभाव खत्म कर स्कूल खुलने से पहले ही शिक्षकों का इंतजाम हो। नियमित शिक्षक न हों तो कम से कम अतिथि शिक्षक तो नियुक्त हों, ताकि स्कूल खुलते ही पढ़ाई शुरू हो और कोर्स समय पर पूरा हो सके।

सरकार गरीबों की अच्छी शिक्षा के प्रति उदासीन है। सरकार दशकों से पर्याप्त शिक्षक भर्ती नहीं कर पाई। अब अतिथि भर्ती में भी विभागों का रोड़ा अटका रही है।
समय-समय पर लोगों के सुझावों पर कोई ध्यान नहीं इस विषय पर लोगों के द्वारा समय-समय पर तमाम माध्यमों से सरकार को सुझाव भी दिए जाते रहते हैं पर सरकार के कानों में जूं भी नहीं रेंगती।जो बड़ी विडंबना है।

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