दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का उद्देश्य आम नागरिक को न्याय दिलाना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है, लेकिन मंडला जिले से सामने आए एक मामले ने पूरी शिकायत निवारण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि भ्रष्टाचार और पंचायत स्तर की अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने के बजाय उन्हें कागजी कार्रवाई के सहारे बंद करने का प्रयास किया जा रहा है।
शिकायतकर्ता के अनुसार शिकायत क्रमांक 32317541, 37271032 एवं 36829043 में पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही से जुड़े दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत किए गए थे। इसके बावजूद न तो स्वतंत्र जांच कराई गई और न ही शिकायतों में उठाए गए सभी बिंदुओं का परीक्षण किया गया। आरोप है कि बिना शिकायतकर्ता की संतुष्टि और बिना वास्तविक समाधान के शिकायतों को ‘निराकृत’ दिखाने की कवायद की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन संचालन के नियम और शिकायत निवारण की प्रक्रिया निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक निराकरण की बात करती है, तो फिर बिना समुचित जांच शिकायतें बंद करने की जल्दबाजी क्यों? क्या शासन की मंशा के विपरीत केवल आंकड़े सुधारने का खेल खेला जा रहा है? यदि ऐसा नहीं है, तो फिर शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की पारदर्शी जांच कराने में हिचकिचाहट क्यों?
यदि किसी अधिकारी ने शिकायतों का वास्तविक परीक्षण किए बिना प्रतिवेदन तैयार किया है, तो यह केवल एक शिकायत का मामला नहीं बल्कि जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शिकायतों का निराकरण नियमों के अनुरूप हुआ या केवल औपचारिकता निभाई गई।
अब यह मामला केवल तीन शिकायतों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि कहीं शिकायत निवारण व्यवस्था में ‘फोर्स क्लोजर’ जैसी प्रवृत्ति तो नहीं पनप रही। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होना उतना ही जरूरी है जितना मूल शिकायतों की निष्पक्ष जांच।
अब निगाहें जिला प्रशासन और शासन पर हैं। क्या शिकायतों की स्वतंत्र जांच कर सच्चाई सामने लाई जाएगी, या फिर भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें फाइलों में ही दफन होती रहेंगी? इसका जवाब प्रशासन की कार्रवाई ही देगी।
