भोपाल की भागदौड़, सर्किट हाउस की बैठकों और तबादलों की उम्मीदों का नहीं दिखा असर, फिर भी जश्न में सबसे आगे रहे कुछ चेहरे
दैनिक रेवांचल टाइम्स सिवनी– हालिया कार्यक्रम में पटाखों और जश्न से ज्यादा चर्चा कुछ खास चेहरों की सक्रियता को लेकर होती रही। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल लगातार उठता रहा कि आखिर वह उत्साह किस बात का था, जबकि जिन उम्मीदों के सहारे पिछले कई दिनों से सियासी गतिविधियां तेज थीं, उनका कोई खास परिणाम सामने नहीं आया।
भोपाल में दो दिन की कवायद भी बेअसर रही
सूत्रों की मानें तो 15 और 16 जून को कुछ चेहरे भोपाल में डेरा जमाए रहे। सर्किट हाउस, विभिन्न कार्यालयों और बड़े होटलों में बैठकों का दौर चलता रहा। माना जा रहा था कि इस सक्रियता का असर प्रशासनिक फेरबदल और तबादलों में देखने को मिलेगा, लेकिन अंतिम तस्वीर ने कई समीकरण बदल दिए।
बैठकें बहुत हुईं, नतीजे कम निकले
चर्चाओं के मुताबिक कई दिनों तक चली रणनीति, मुलाकातें और प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। जिन लोगों को अपने प्रभाव पर पूरा भरोसा था, वे भी अंतिम सूची आने के बाद असहज दिखाई दिए। राजनीतिक हलकों में यह टिप्पणी भी सुनाई देती रही कि इस बार समीकरण कहीं और से तय हुए और कई पुराने दावे हवा हो गए।
जश्न में सबसे आगे रहे ‘फटे नोट’ चेहरे
दिलचस्प बात यह रही कि जिन चेहरों को अब व्यवस्था भी ज्यादा तवज्जो देती नहीं दिख रही और जिनकी राजनीतिक चमक पहले जैसी नहीं रही, वे ही कार्यक्रम में सबसे आगे नजर आए। पटाखे फोड़ने से लेकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने तक किसी तरह की कमी नहीं छोड़ी गई।
समझने वाले समझ गए, बाकी ने तमाशा देखा
कार्यक्रम के दौरान कानाफूसी का दौर भी चलता रहा। लोगों के बीच एक ही बात बार-बार सुनाई दी कि जिनकी बैठकों से बड़े फैसले होने की उम्मीद थी, उनका असर कहीं दिखाई नहीं दिया। इसके बावजूद मंच, कैमरे और जश्न के बीच अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश जारी रही।
राजनीतिक गलियारों में एक टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में रही— “कुछ लोग अभी भी पुराने नोट की तरह खुद को चलन में मान रहे हैं, जबकि बाजार बहुत पहले बदल चुका है।”
फिलहाल नाम किसी का नहीं लिया जा रहा, लेकिन इशारे इतने साफ हैं कि समझने वालों के लिए इतना ही काफी है।
