दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
मंडला जिले की जनपद पंचायत मोहगांव इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा प्रशासनिक विवादों को लेकर चर्चा में है। मुख्य कार्यपालन अधिकारी कमल रंधावा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि जनपद पंचायत की सामान्य सभा में सर्वसम्मति से पारित प्रस्तावों को दरकिनार कर कार्यालय अपनी मर्जी से चलाया जा रहा है, जिससे पंचायती राज व्यवस्था की भावना पर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि लोकतंत्र में सामान्य सभा सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था होती है, लेकिन मोहगांव जनपद में उसके प्रस्ताव फाइलों में धूल फांक रहे हैं। आरोप है कि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए पारित प्रस्तावों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
इतना ही नहीं, सीईओ पर कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार, मनमाने निर्णय लेने तथा शासकीय नियमों की अनदेखी करने के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना पर सीधा आघात माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जनपद पंचायत की सामान्य सभा केवल औपचारिकता बनकर रह गई है? यदि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के प्रस्तावों का कोई महत्व नहीं, तो फिर बैठकों, चर्चाओं और प्रस्तावों का औचित्य क्या है?
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यदि यही रवैया जारी रहा तो विकास कार्य प्रभावित होंगे और जनता का पंचायत व्यवस्था से विश्वास कमजोर होगा। आखिर अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह हैं या केवल अपनी इच्छा के अनुसार प्रशासन चलाने के लिए स्वतंत्र?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या कलेक्टर और जिला पंचायत के वरिष्ठ अधिकारी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएंगे? क्या सामान्य सभा के प्रस्तावों की अनदेखी और कथित मनमानी की जवाबदेही तय होगी, या फिर पूरा मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दब जाएगा?
यदि जनप्रतिनिधियों के आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल एक अधिकारी की कार्यशैली का मामला नहीं, बल्कि पंचायती राज व्यवस्था की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की भी परीक्षा है। अब प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि मोहगांव में शासन का कानून चलेगा या किसी अधिकारी की मनमर्जी।
