आखिर किसकी शह पर काटी जा रही अवैध कॉलोनियांकरोड़ों के खेल में शासन को चूना, जिम्मेदार विभाग मौन

Revanchal
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रेवांचल टाइम्स मंडला जिला मुख्यालय और उसके आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों अवैध कॉलोनियों का कारोबार बेलगाम होता जा रहा है। शहर के विस्तार के नाम पर कृषि भूमि को प्लाटों में तब्दील कर खुलेआम बेचा जा रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि न तो इन परियोजनाओं के पास आवश्यक शासकीय स्वीकृतियां हैं और न ही विकास कार्यों की कोई वैधानिक व्यवस्था दिखाई देती है। इसके बावजूद प्लाटों की बिक्री धड़ल्ले से जारी है और जिम्मेदार विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं।

शहर से पांच से सात किलोमीटर की परिधि में स्थित कटरा बायपास, चाटुआमार, सेमरखापा, बिनेका, खैरी, आमानाला, महाराजपुर, कारिकोंन, मोहनटोला, देवदरा, पुरवा, रामबाग और सखवाह जैसे क्षेत्रों में कृषि भूमि पर तेजी से कॉलोनियां विकसित किए जाने की चर्चाएं आम हो गई हैं। आरोप है कि उपजाऊ खेती की जमीनों को पहले “पड़त भूमि” बताकर खरीदा जाता है और बाद में बिना वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए सैकड़ों प्लाट काटकर बेच दिए जाते हैं।नियमों के अनुसार किसी भी आवासीय कॉलोनी के विकास के लिए भूमि डायवर्सन, स्वीकृत ले-आउट, नगर एवं ग्राम निवेश (टीएनसीपी) की अनुमति, पर्यावरणीय मानकों का पालन तथा कई अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं अनिवार्य होती हैं। बड़े प्रोजेक्टों में रेरा पंजीयन भी आवश्यक होता है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चाएं हैं कि अनेक स्थानों पर इन प्रक्रियाओं को दरकिनार कर केवल नक्शे और सपनों के सहारे प्लाट बेचे जा रहे हैं।
आरोप यह है कि किसानों से जमीन खरीदते समय करोड़ों रुपये के सौदे किए जाते हैं, लेकिन जब रजिस्ट्री का समय आता है तो दस्तावेजों में वास्तविक कीमत से काफी कम राशि दर्शाई जाती है। सूत्रों का दावा है कि एक तरफ वास्तविक लेन-देन करोड़ों में होता है, वहीं दूसरी तरफ शासकीय रिकॉर्ड में लाखों रुपये की रजिस्ट्री कराकर स्टांप शुल्क और राजस्व की बड़ी हानि पहुंचाई जाती है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल अवैध प्लाटिंग का मामला नहीं, बल्कि राजस्व चोरी और वित्तीय अनियमितताओं का भी विषय है।


स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कॉलोनाइजर लोगों को चौड़ी सड़कें, बिजली, पानी, गार्डन, ड्रेनेज, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं के सपने दिखाकर प्लाट बेच रहे हैं। लेकिन जमीन की रजिस्ट्री होने के बाद अधिकांश खरीदारों को मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। कई स्थानों पर न सड़क है, न नाली, न स्ट्रीट लाइट और न ही पेयजल की कोई स्थायी व्यवस्था। इसके बावजूद प्लाटों की बिक्री लगातार जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्वीकृत ले-आउट के काटे गए प्लाट भविष्य में खरीदारों के लिए बड़ी कानूनी समस्या बन सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों में भवन निर्माण की अनुमति, बैंक ऋण, बिजली कनेक्शन और अन्य सरकारी सुविधाओं को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। सबसे बड़ा नुकसान उस आम नागरिक का होता है जो जीवन भर की जमा पूंजी लगाकर अपने सपनों का आशियाना बनाने के लिए प्लाट खरीदता है।


चिंता का विषय यह भी है कि शहर के आसपास की उपजाऊ कृषि भूमि तेजी से कंक्रीट के जंगल में बदलती जा रही है। जिस भूमि पर कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां आज बिना किसी दीर्घकालिक योजना के प्लाट काटे जा रहे हैं। कृषि भूमि का यह अनियंत्रित दोहन भविष्य में खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी चुनौती बन सकता है।लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर अवैध प्लाटिंग का कारोबार चल कैसे रहा है क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं है यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही नगर एवं ग्राम निवेश, राजस्व विभाग, पंजीयन विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में प्लाटों की बिक्री और कॉलोनियों का विकास बिना किसी प्रशासनिक जानकारी के संभव नहीं माना जा सकता।जानकारों का कहना है कि यदि जिले में पिछले कुछ वर्षों में हुई भूमि खरीदी-बिक्री, डायवर्सन प्रकरणों, कॉलोनी विकास अनुमतियों और रजिस्ट्रियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। विशेष रूप से उन मामलों की जांच जरूरी है जहां वास्तविक बाजार मूल्य और दस्तावेजों में दर्ज मूल्य के बीच भारी अंतर दिखाई देता है।


आम नागरिक ने भी इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि अवैध कॉलोनियों के नाम पर न केवल किसानों और प्लाट खरीदारों को भ्रमित किया जा रहा है, बल्कि शासन को भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया जा रहा है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसकी शह पर यह खेल चल रहा है कौन हैं वे लोग जिनके संरक्षण में कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनियों का जाल फैलता जा रहा है क्यों जिम्मेदार विभागों की कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है और कब तक आम नागरिकों को विकास के नाम पर अधूरे सपने बेचकर ठगा जाता रहेगा।फिलहाल जिला मुख्यालय के आसपास अवैध प्लाटिंग और कॉलोनियों का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है।

जनता चाहती है कि प्रशासन केवल नोटिस जारी करने तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर उतरकर जांच करे, दोषियों की जवाबदेही तय करे और उन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे जो नियम-कानूनों को ताक पर रखकर करोड़ों रुपये का कारोबार संचालित कर रहे हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह अव्यवस्थित शहरीकरण, राजस्व हानि और आम नागरिकों के साथ बड़े आर्थिक धोखे का कारण बन सकता है।

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