RTI से खुलासा, जांच रिपोर्ट दबाने का आरोप; किसान बोले—”योजनाओं का लाभ नहीं, लूट का हिसाब मिल रहा है”
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला/ डिंडौरी आदिवासी बाहुल्य जिले में किसानों की योजनाओं में लूट करने में भले ही जिले अलग हो पर लूटने वाले अधिकारी एक ही जहाँ डिंडौरी जिले के बाद मंडला जिले के किसानो के साथ वही कार्य किया जा रहा है और किसानो की योजनाओं में फर्जीवाड़ा डिंडौरी जिले की तर्ज में मंडला जिले में करने के गंभीर आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं, और जहाँ इन्हें किसान कल्याण एंव कृषि विभाग से हटाने को लेकर प्रदेश सरकार को किसानों से लेकर जनपद सदस्य मंत्री विधायक सांसद तक अपने लेटर हेड का उपयोग कर प्रदेश सरकार को लिखित शिक़वा शिकायत कि गई पर अश्वनी झारिया जो अपने पद से हटने की जगह तो छोड़ दो वह तो अंगद के पैर की तरह साबित हो रहे है जो सब पर भारी पड़ गए है जहाँ जनप्रतिनिधियों से लेकर किसानो के द्वारा और जबलपुर की आर्थिक अपराध अन्वेषण व्यूरो जबलपुर तक की जांच टीम को मात दे चुके है और आज भी मंडला में अपने पद पर बने हुए हैं, इसे क्या समझे कि जिस अधिकारी कर्मचारी की भ्रष्टाचार ग़बन घोटाले की जितनी बड़ी शिकायत वह उतने बड़े पद पर।


वही जानकारी के अनुसार किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने के उद्देश्य से संचालित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) अब डिंडौरी जिले में गंभीर सवालों के घेरे में है। सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त दस्तावेजों, विभागीय पत्राचार और जांच समिति के समक्ष दिए गए लिखित बयानों के आधार पर यह आरोप सामने आए हैं कि NFSM के तहत चना प्रदर्शन योजना में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी, अवैध वसूली, फर्जीवाड़ा और दस्तावेजी हेरफेर किया गया।
आरोप है कि जहां शासन के नियमों के अनुसार एक हेक्टेयर के किसान को 75 किलो चना बीज दिया जाना था और मात्र ₹775 कृषक अंश लिया जाना था, वहीं अधिकारियों के कथित मौखिक निर्देश पर 30-30 किलो की बोरियां तैयार कर किसानों से ₹900, ₹1300 और ₹1500 तक वसूले गए।
नियम कुछ और, जमीन पर खेल कुछ और
वही दस्तावेजों के अनुसार NFSM चना प्रदर्शन योजना में किसानों को 75 किलो बीज मिलना था। लेकिन आरोप है कि तत्कालीन प्रभारी उप संचालक अभिलाष चौरसिया तथा वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी हरि शरण अथिया के मौखिक निर्देशों पर पूरे जिले में 30 किलो की बोरियां तैयार कर वितरित की गईं। इतना ही नहीं, अलग-अलग विकासखंडों में किसानों से अलग-अलग राशि वसूली गई।
किसानों का सवाल है कि यदि योजना पूरे जिले में एक ही है, तो फिर कहीं ₹900, कहीं ₹1300 और कहीं ₹1500 क्यों लिए गए?
जांच समिति के सामने कर्मचारी का बयान बना बड़ा आधार
ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी शकुन धुर्वे द्वारा जांच समिति के समक्ष 27 जून 2025 को दिए गए स्वहस्ताक्षरित लिखित बयान में कई गंभीर तथ्य सामने आने का दावा किया गया है।
बयान के अनुसार वर्ष 2021-22 में उन्हें 850 बोरी (255 क्विंटल) चना बीज प्राप्त हुआ था, जिसकी राशि ₹7,59,000 कार्यालय में जमा कराई गई। लेकिन बाद में स्टॉक पंजी में उनके नाम के सामने 469.20 क्विंटल बीज दर्ज कर दिया गया।
बयान में यह भी उल्लेख है कि उनसे कोरे स्टॉक रजिस्टर पर पहले हस्ताक्षर कराए गए, बाद में उसमें मात्रा दर्ज की गई। साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि अधिकारियों के मौखिक निर्देश पर 30 किलो बीज के लिए ₹900 कृषक अंश लेने को कहा गया था।
यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी अभिलेखों से छेड़छाड़ का भी गंभीर मामला बन सकता है।
सातों विकासखंडों में एक जैसी शिकायतें
आरोप है कि यह मामला किसी एक विकासखंड तक सीमित नहीं रहा। डिंडौरी, समनापुर, अमरपुर, बजाग, करंजिया, शहपुरा और मेहंदीवानी सहित जिले के सातों विकासखंडों में किसानों को निर्धारित मात्रा से कम बीज देकर अधिक राशि वसूली गई।
यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह पूरे जिले में संचालित एक संगठित वित्तीय अनियमितता का मामला माना जा सकता है।
नोडल अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल
NFSM की जिला नोडल अधिकारी डॉ. नेहा धुरिया पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि योजना के तहत आवश्यक 10 प्रतिशत भौतिक सत्यापन समय पर नहीं किया गया। यदि नियमित निरीक्षण होता तो किसानों को कम बीज देकर अधिक राशि वसूलने की शिकायतें प्रारंभिक स्तर पर ही सामने आ सकती थीं।
449 पृष्ठ की जांच रिपोर्ट और RTI में विरोधाभास
वही दस्तावेज बताते हैं कि समनापुर और अमरपुर विकासखंडों की कुल 449 पृष्ठों की जांच रिपोर्ट संबंधित कार्यालयों में जमा कराई गई थी। इसके बावजूद 30 अप्रैल 2026 को सूचना के अधिकार के तहत दिए गए उत्तर में यह कहा गया कि स्थापना शाखा को जांच रिपोर्ट प्राप्त ही नहीं हुई।
यही विरोधाभास अब पूरे मामले को और अधिक संदेहास्पद बना रहा है।
किसानों के नाम पर योजनाएं, फायदा किसे? सरकार लगातार किसानों के हित में नई-नई योजनाओं की घोषणा कर रही है, लेकिन यदि विभागीय स्तर पर ही योजनाओं को कथित रूप से भ्रष्टाचार का माध्यम बना दिया जाए तो सबसे बड़ा नुकसान उसी किसान को होता है जिसके नाम पर योजनाएं बनाई जाती हैं।
वही यह मामला केवल बीज वितरण का नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता, प्रशासनिक जवाबदेही और किसानों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
उठ रहे हैं बड़े सवाल
75 किलो की जगह 30 किलो बीज किसके आदेश पर वितरित हुआ?
₹775 के स्थान पर ₹900 से ₹1500 तक वसूली किस आधार पर हुई? कोरे स्टॉक रजिस्टर पर हस्ताक्षर क्यों कराए गए? जांच रिपोर्ट उपलब्ध होने के बावजूद RTI में “रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई” का उत्तर किसके निर्देश पर दिया गया?
यदि करोड़ों रुपये की योजना में इतनी बड़ी अनियमितताएं हुईं तो जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
किसानों की मांग
किसानों और शिकायतकर्ता द्वारा मांग की गई है कि पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाए तथा किसानों से कथित रूप से अतिरिक्त वसूली गई राशि वापस कराई जाए।
