भ्रष्टाचार पर सिस्टम फिर कटघरे में उपसंचालक अश्वनी झारिया

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कृषि उपसंचालक अश्वनी झारिया पर विभागीय जांच के आदेश तो जारी हो गए हैं, लेकिन बड़ा सवाल अब भी वहीं खड़ा है—क्या यह जांच वास्तव में निष्पक्ष होगी या फिर यह भी सिर्फ फाइलों तक सीमित एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी?

डिंडोरी से लेकर मंडला तक, आरोपों की लिस्ट छोटी नहीं है—किसानों के लिए आने वाले अनाज में गड़बड़ी, योजनाओं में करोड़ों का कथित भ्रष्टाचार, और बीज-दवा विक्रेताओं से अवैध वसूली जैसे गंभीर मामले पहले से चर्चा में हैं। इतना ही नहीं, आर्थिक अपराध शाखा (EOW) में मामला दर्ज होने के बावजूद कार्यशैली में बदलाव न आना, सिस्टम की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़ा करता है।
दैनिक रेवांचल टाइम्स द्वारा लगातार उजागर किए गए मामलों और वायरल ऑडियो के बाद विभाग हरकत में जरूर आया है। पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन और 7 दिनों में जवाब तलब—कागजों पर यह कार्रवाई सख्त नजर आती है। लेकिन अनुभव कहता है कि ऐसे कई मामलों में जांच सिर्फ “खाना पूर्ति” बनकर रह जाती है।
सिस्टम पर सबसे बड़ा सवाल
क्या यह जांच सच में दोषियों तक पहुंचेगी?
या फिर वही पुराना खेल—फाइलें चलेंगी, बयान होंगे, और अंत में “कोई ठोस सबूत नहीं मिला” कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
अगर एक अधिकारी पर पहले से गंभीर आरोप हैं और फिर भी वह खुलेआम कार्य करता रहता है, तो सवाल सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर उठता है।
“भ्रष्टाचार का अभयदान विभाग”
ऐसा प्रतीत होता है मानो कुछ अधिकारियों को अदृश्य “अभयदान” प्राप्त हो—
जहां आरोप लगना सामान्य बात है,
जांच होना एक औपचारिकता,
और परिणाम… पहले से तय।
अगर यही हाल रहा, तो किसान योजनाएं कागजों में ही फलती-फूलती रहेंगी और जमीनी स्तर पर सिर्फ भ्रष्टाचार की फसल लहलहाती रहेगी।
जनता का सवाल, जवाब कौन देगा?
अब नजर इस बात पर है कि यह जांच
सच्चाई सामने लाती है
या
सिस्टम की कमजोरियों को फिर छुपा जाती है
क्योंकि इस बार सवाल सिर्फ एक भ्रष्ट अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता का है।
