वन कटे, नदियां जहर बनीं, जंगल उजड़े… अब प्रकृति दे रही विनाश की चेतावनी
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। धरती पर जीवन का संतुलन तेजी से टूट रहा है और इसके सबसे बड़े जिम्मेदार खुद इंसान बन चुके हैं। कभी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली प्रजातियों की विलुप्ति अब मानव लालच, अंधाधुंध विकास और पर्यावरणीय दोहन के कारण भयावह स्तर पर पहुंच गई है। “राष्ट्रीय लुप्तप्राय प्रजाति दिवस” केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि प्रकृति का वह मौन विलाप है जो मानव सभ्यता को आने वाले विनाश का संकेत दे रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार वर्तमान समय में प्रजातियों के खत्म होने की रफ्तार प्राकृतिक दर से करीब 1000 गुना अधिक हो चुकी है। पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी से आधे से अधिक पक्षी, स्तनधारी, मछलियां, सरीसृप और उभयचर प्रजातियां या तो समाप्त हो चुकी हैं या विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट के मुताबिक दुनिया भर में 48 हजार से अधिक प्रजातियां गंभीर खतरे में हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अवैध शिकार, प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, रासायनिक खेती और जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक आवासों को तबाह कर दिया है। शहरों के विस्तार और विकास परियोजनाओं की कीमत अब वन्यजीव चुका रहे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि कई प्रजातियां अपने बदलते वातावरण के अनुरूप खुद को ढाल ही नहीं पा रहीं।
पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में खाद्य श्रृंखला बुरी तरह चरमरा जाएगी। इसका सीधा असर मानव जीवन, कृषि उत्पादन और प्राकृतिक संतुलन पर पड़ेगा। सूक्ष्म जीवों से लेकर विशाल व्हेल तक, हर प्रजाति पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी है। एक प्रजाति का खत्म होना पूरे पर्यावरणीय ढांचे को कमजोर कर देता है।
भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। जैव विविधता के लिहाज से समृद्ध देशों में शामिल होने के बावजूद देश की लगभग 14 प्रतिशत प्रजातियां गंभीर खतरे में हैं। हालांकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलीफेंट और प्रोजेक्ट चीता जैसी योजनाएं संरक्षण की दिशा में अहम प्रयास मानी जा रही हैं, लेकिन तेजी से बढ़ता पर्यावरणीय विनाश इन प्रयासों पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।
हैदराबाद स्थित अत्याधुनिक वन्यजीव जैव-प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाएं कृत्रिम गर्भाधान, डीएनए बैंक और क्रायोप्रिजर्वेशन जैसी तकनीकों के जरिए लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने में जुटी हैं। काले हिरण, चित्तीदार हिरण और निकोबार कबूतर जैसी प्रजातियों के सफल संरक्षण ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल प्रयोगशालाएं प्रकृति को बचा पाएंगी?
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जब तक सरकारें कठोर पर्यावरणीय नीतियां लागू नहीं करेंगी, अवैध शिकार और जंगल विनाश पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी और आमजन प्रकृति संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक पृथ्वी पर जीवन का संतुलन लगातार बिगड़ता रहेगा।
आज जरूरत केवल योजनाओं की नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशील सोच और ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। क्योंकि यदि प्रजातियां खत्म होती रहीं, तो अगली सूची में कहीं मानव सभ्यता का नाम भी शामिल न हो जाए।
