किसानों के हक पर 97 लाख का डाका? राष्ट्रीय तिलहन मिशन में भ्रष्टाचार का विस्फोट, फिर कठघरे में प्रभारी उप संचालक अश्वनी झारिया
किसान कल्याण के नाम पर फर्जी बिल, बिना स्टॉक के भुगतान, बाजार से ढाई गुना महंगी सामग्री, कागजों में प्रशिक्षण और किसानों के नाम पर सरकारी राशि की कथित बंदरबांट—क्या कार्रवाई से ऊपर हैं जिम्मेदार?
दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला
आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में किसानों के उत्थान के लिए संचालित राष्ट्रीय तिलहन मिशन अब कथित तौर पर भ्रष्टाचार का नया अड्डा बनता दिखाई दे रहा है। किसानों की आय बढ़ाने और तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी योजना में करीब 97 लाख रुपये के कथित घोटाले के आरोप सामने आए हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि जिन आरोपों की फाइलें वर्षों से विभिन्न स्तरों पर घूम रही हैं, उन पर अब तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई।
कृषि विभाग के प्रभारी उप संचालक अश्वनी झारिया का नाम पहले भी कई शिकायतों और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में सामने आता रहा है। सूत्रों के अनुसार डिंडोरी से लेकर मंडला तक किसानों की योजनाओं में कथित गड़बड़ियों की शिकायतें हुईं, आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने भी दस्तावेजों की पड़ताल की, लेकिन कार्रवाई आज तक ठंडी पड़ती नजर आ रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी ताकत है, जो हर शिकायत के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों को बचा लेती है?
फर्जी बिलों के सहारे सरकारी खजाने पर कथित हमला
सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय तिलहन मिशन के तहत जिले में लगभग 1100 हेक्टेयर में प्रदर्शन (डेमो) का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। प्रत्येक किसान को 9000 रुपये की सहायता सामग्री उपलब्ध कराई जानी थी।
आरोप है कि प्रति प्रदर्शन लगभग 7650 रुपये की सामग्री “नर्मदा कृषि सेवा केंद्र” के नाम से बिल लगाकर निकाल ली गई, जबकि संबंधित प्रतिष्ठान के पास इतनी बड़ी मात्रा में सामग्री उपलब्ध होने के प्रमाण ही नहीं थे। यदि यह आरोप सही हैं, तो बिना स्टॉक के भुगतान कैसे हो गया? किसने सत्यापन किया? किस अधिकारी ने बिलों का भुगतान स्वीकृत किया?
1000 रुपये का स्प्रे, बिल में 2500 रुपये!
मामले में सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि बाजार में लगभग 1000 रुपये में मिलने वाले स्प्रे की कीमत 2500 रुपये दर्शाकर सरकारी राशि निकाली गई। यानी किसानों के नाम पर सरकारी धन को कथित रूप से कई गुना बढ़ाकर खर्च दिखाया गया।
यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो जाए, तो करोड़ों रुपये के घोटाले की परतें खुलने से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रशिक्षण केवल कागजों में, किसानों तक नहीं पहुंचा लाभ
योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण देना भी अनिवार्य था, लेकिन सूत्रों का दावा है कि अधिकांश स्थानों पर कोई प्रशिक्षण आयोजित ही नहीं हुआ। इसके बावजूद रिकॉर्ड में प्रशिक्षण कार्यक्रम और व्यय दर्शा दिया गया। यदि यह सही है, तो किसानों के नाम पर सरकारी धन का यह सीधा दुरुपयोग माना जाएगा।
किसानों का हक किसने छीना?
सूत्र बताते हैं कि बड़ी राशि अग्रिम निकालकर कथित रूप से आपस में बांट ली गई, जबकि वास्तविक लाभार्थी किसान आज भी योजनाओं के पूरे लाभ से वंचित हैं। जिन योजनाओं से किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होनी थी, वे कथित रूप से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं।
आखिर कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बार-बार शिकायतें, दस्तावेज, विरोध प्रदर्शन और जांच की चर्चाओं के बावजूद अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या किसानों के अधिकारों से जुड़े मामलों में भी जवाबदेही समाप्त हो चुकी है? क्या भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा?
यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि आदिवासी अंचल के किसानों के अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
