घुघरी का संजय निकुंज उद्यान बना “कागजी स्वर्ग”

Revanchal
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ज़मीन पर कब्जों का जंगल…!

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/ मंडला जिले के तहसील मुख्यालय घुघरी का कभी गौरव रहा संजय निकुंज उद्यान आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जहां कभी हरियाली, फूलों की खुशबू और प्रकृति की सुंदरता लोगों को आकर्षित करती थी, आज वहीं सूखे पेड़, बिखरी व्यवस्था और बढ़ते अतिक्रमण अपनी कहानी खुद बयान कर रहे हैं।


सूत्रों की मानें तो उद्यान अब “प्रकृति प्रेमियों” से ज्यादा “कब्जाधारियों” का पसंदीदा स्थान बनता जा रहा है। सवाल उठता है कि आखिर यह सब जिम्मेदारों की नाक के नीचे कैसे हो रहा है? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर मौन सहमति…?


बताया जाता है कि यहां पदस्थ अधिकारी-कर्मचारी हफ्ते में गिनती के दिन ही नजर आते हैं। बाकी समय उद्यान भगवान भरोसे और मजदूरों के सहारे चल रहा है। फाइलों में पेड़-पौधे आज भी हरे-भरे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में वे सूखते हुए नजर आते हैं। ऐसा लगता है जैसे “हरियाली” अब सिर्फ कागजों में ही बची है।


और सबसे चौंकाने वाली बात—उद्यान की जमीन पर धीरे-धीरे कब्जाधारी अपना कब्जा जमाते जा रहे है, और अपनी मौज उड़ा रहे हैं। तो वही संबंधित विभाग गहरी नींद पर खर्राटे लेकर सो रहा हैं।

अगर आने वाले दिनों पर विभागीय अधिकारियों और संबंधित जिम्मेदारों का यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा परिसर अतिक्रमण की भेंट चढ़ जाएगा और सरकारी जमीन निजी उपयोग की वस्तु बनकर रह जाएगी।

“हरियाली फाइलों में, कब्जा मैदान में”

घुघरी का संजय निकुंज उद्यान अब नया मॉडल बन चुका है—

“फाइलों में हरा भरा गार्डन, जमीन पर प्लॉटिंग”।

घुघरी में उद्यानिकी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी शायद कोई नया प्रयोग कर रहे हैं—
पेड़-पौधों को पानी देने और जमीन पर हरियाली लाने की बजाय फाइलों में “हरी स्याही” से उद्यान को सींचा जा रहा है। ताकि भविष्य में शिकवा शिकायत और खबरों के प्रकाशन के बाद में जब कोई संबंधित सक्षम अधिकारी जांच करें तो उस हरियाली को जमीन पर न दिखा कर के फाइलों में दिखाई जायेगी।


उद्यान में अब दो ही चीजें तेजी से बढ़ रही हैं:-
कागजी हरियाली और
जमीन पर अतिक्रमण
बाकी जमीन पर लगे पेड़-पौधे तो मानों जैसे “ट्रांसफर” होकर फाइलों में चले गए हों।
सम्बन्धित विभाग और जिम्मेदार की कार्यशैली तो और भी ज़्यादा काबिल-ए-तारीफ है— क्योंकि


ऑफिस में आकर हाजिरी लगाओ, फाइलों को हरा-भरा दिखाओ और फिर “प्रकृति संरक्षण” का प्रमाणपत्र खुद से ही ले लो। रही बात अतिक्रमण…की तो आज तक न संबंधित विभाग के द्वारा राजस्व विभाग और पुलिस विभाग को इसकी लिखित सूचना या जानकारी दी गई हैं, और न ही कब्जाधारियों के विरुद्ध कोई ठोस कदम उठाए गए है। इसलिए तो घुघरी तहसील में शायद “विकास” का नया रूप देखने को मिल रहा है, जिसे देख जिम्मेदार आंखें मूंदकर समर्थन दे रहे हैं। और अतिक्रमणकारियों को भस्मासुर वाला आशीर्वाद प्रदान कर खुद के विभाग की जमीन को मिटाने को लगे हुए हैं।

अब सवाल जनता का

क्या संबंधित विभाग और प्रशासन इस “कागजी उद्यान” की सच्चाई सामने लाएगा?
या फिर संजय निकुंज यूं ही फाइलों में हरा-भरा और जमीन पर उजड़ा हुआ नजर आता रहेगा…?

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