दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले के जनपद नैनपुर में में अजब गजब खेल चल रहे है जहाँ साधु के भेष डाकू घूम रहे है जिनके ऊपर आधा दर्जन मामला दर्ज वह अब वेशभूषा बदल कर समाज सेवी बन कर लूट रहे है, और लोगो से उगाही करने के नित्य नए कारनामें कर रहे है लोगों को आंखों में धूल झोखने में माहिर नैनपुर के समाज सेवी जो कभी नेताओ की चाटूकारिता करना तो कभी पुलिस के तलवे चाट कर दलाली कर अबैध वसूली करना और अब नया धंधा जो कि समाजसेवा भी अब आधुनिक हो चली है। पुराने जमाने में लोग भूखे को खाना, बेसहारा को आश्रय और बीमार को इलाज दिलाने की कोशिश करते थे, मगर अब कुछ स्वयंभू समाजसेवियों ने सेवा का एक नया “मॉडल” खोज निकाला है, जहाँ संवेदना कम और प्रदर्शन ज्यादा दिखाई देता है। कहते हैं नगर में वर्षों से घूम रही एक विक्षिप्त महिला अचानक “समाजसेवा परियोजना” का हिस्सा बन गई। महिला को सड़क से उठाकर अस्पताल पहुँचाया गया। अब अस्पताल वाले भी परेशान, जिसे कोई खास बीमारी नहीं, उसका इलाज आखिर किस बात का करें? लेकिन जब समाजसेवा कैमरे के साथ आती है, तो इलाज भी मजबूरी बन जाता है, जांचें हुईं, फोटो खिंचे, सहानुभूति जागी और चर्चा शुरू।
फिर शुरू हुआ “मानवता अभियान”। तस्वीरें दिखाइए, संवेदना जगाइए, और मदद की अपील कीजिए। नकद सहयोग का अपना अलग ही लाभ है, न हिसाब पूछने वाला, न रसीद माँगने वाला। दान देने वाला भी संतुष्ट कि उसने पुण्य कमाया, और सवाल पूछने वाला असंवेदनशील घोषित।
लेकिन नगर पूछ रहा है, यदि महिला की चिंता इतनी ही थी, तो क्या उसके लिए कोई स्थायी आश्रय, पुनर्वास या देखभाल की व्यवस्था हुई? या फिर समाजसेवा की कहानी उतने दिन चली, जितने दिन तक उसकी “उपयोगिता” रही?
आज वही महिला फिर सड़क पर है, पहले जैसी, उसी हालत में। फर्क बस इतना है कि कहानी बदल गई, तस्वीरें पुरानी हो गईं और नगर में एक नया सवाल खड़ा हो गया क्या हमारी संवेदनाएँ भी अब किसी का साधन बनती जा रही हैं?
“सेवा या संग्रह अभियान?”नगर में नई समाजसेवा का मॉडल!
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