दैनिक रेवांचल टाइम्स:जबलपुर/भेड़ाघाट।
हाल ही में हुए बरगी डैम क्रूज हादसा ने पूरे जिले को झकझोर दिया था। कई जिंदगियां दांव पर लग गईं और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इतने बड़े हादसे के बाद भी जिम्मेदार विभागों की नींद नहीं खुली है। इसका ताजा उदाहरण धुआंधार जलप्रपात में देखने को मिल रहा है, जहां रोजाना सैकड़ों लोग अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।
धुआंधार जलप्रपात, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए देशभर में प्रसिद्ध है, इन दिनों लापरवाही और अव्यवस्था का केंद्र बनता जा रहा है। यहां पर्यटक खतरनाक चट्टानों पर चढ़कर “मौत वाली सेल्फी” लेने में लगे हैं। कई लोग बिना किसी डर के नर्मदा नदी के तेज बहाव के बीच उतरकर चट्टानों के बीच नहाते नजर आ रहे हैं। यह न केवल उनकी जान के लिए खतरा है, बल्कि किसी भी समय बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि मौके पर सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नजर नहीं आता। ना कोई पुलिसकर्मी तैनात है, ना सुरक्षा गार्ड, ना ही किसी प्रकार की चेतावनी पट्टिका या बैरिकेडिंग। प्रशासन की यह लापरवाही सीधे तौर पर लोगों की जान के साथ खिलवाड़ है। अगर इसी तरह हालात बने रहे, तो किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।
स्थानीय लोगों और पर्यटकों का कहना है कि कई बार प्रशासन को इस स्थिति से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। बरगी डैम हादसे के बाद उम्मीद थी कि प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।
जनता स्वयं भी जिम्मेदार
यह भी सच है कि आम जनता भी जिम्मेदार है, जो थोड़ी सी रोमांच के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन की जिम्मेदारी यहीं खत्म हो जाती है? भीड़ को नियंत्रित करना, सुरक्षा सुनिश्चित करना और हादसों को रोकना प्रशासन का ही दायित्व है।
अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो धुआंधार जलप्रपात अगली बड़ी त्रासदी का गवाह बन सकता है। जरूरत है तत्काल प्रभाव से सुरक्षा इंतजाम बढ़ाने की—जिसमें पुलिस बल की तैनाती, खतरनाक क्षेत्रों में बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड और निगरानी व्यवस्था शामिल हो।
हादसे का इंतजार करता प्रशासन
अब सवाल यह है कि प्रशासन कब जागेगा? क्या एक और हादसे का इंतजार किया जा रहा है? या फिर किसी बड़ी जनहानि के बाद ही व्यवस्था सुधरेगी? फिलहाल, धुआंधार में चल रहा यह “मौत का खेल” प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
