
रेवांचल टाइम्स मंडला। देश-विदेश में अपनी समृद्ध जैव विविधता और बाघों की बड़ी आबादी के लिए प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क इन दिनों सवालों के घेरे में है।सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार बीते एक वर्ष के भीतर यहां 12 बाघों की मौत ने ना सिर्फ वन्यजीव प्रेमियों बल्कि स्थानीय समाज, पत्रकार जगत और प्रशासनिक तंत्र को भी झकझोर दिया है।
लगातार हो रही इन मौतों ने पार्क प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, वहीं मौतों के कारणों को लेकर दिए जा रहे आधिकारिक बयान भी संदेह के घेरे में हैं। मौतों का सिलसिला नहीं थम रहा ताजा मामला सोमवार, 4 मई का है, जब किसली रेंज के मगरनाला बीट में गश्ती दल को लगभग 4 वर्ष के एक नर बाघ का शव मिला। इस घटना के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि कान्हा में बाघों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। जनवरी 2026 से अब तक 7 बाघों की मौत हो चुकी है, जिनमें एक बाघिन और उसके चार शावक भी शामिल हैं।वन विभाग द्वारा अधिकांश मामलों में मौत का कारण “संक्रमण” या “प्राकृतिक कारण” बताया जा रहा है, लेकिन सूत्रों की मानें तो कई घटनाओं में तथ्य छिपाने या गोलमोल जवाब देने के आरोप लग रहे हैं। यही वजह है कि अब यह मुद्दा स्थानीय स्तर पर आक्रोश का कारण बन गया है।
घटनाओं की लंबी श्रृंखला यदि पिछले एक साल की घटनाओं पर नजर डालें, तो तस्वीर और भी चिंताजनक नजर आती है जानकारी अनुसार 27 मई 2025: मुंडीदादर बीट में मादा बाघिन “मोहिनी” की दो चट्टानों के बीच फंसने से मौत।
22 जुलाई 2025: बंजर नदी में एक बाघ बहता हुआ मिला, जिसके पंजे में करंट का तार फंसा था।
2 अक्टूबर 2025: मुक्की रेंज में एक नर बाघ के हमले में दूसरे बाघ “बालाघाट मेल” की मौत।
उसी दिन: दो शावकों की भी नर बाघ के हमले में मौत 6 अप्रैल 2026 कन्हारी बीट में मादा बाघिन “सुनैना” मृत पाई गई।21, 24 और 25 अप्रैल 2026: सरही क्षेत्र में तीन अलग अलग स्थानों पर शावकों के शव मिले।29 अप्रैल 2026 मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में “टी-141” नामक बाघिन और एक शावक की इलाज के दौरान मौत।इन घटनाओं की श्रृंखला यह संकेत देती है कि समस्या केवल प्राकृतिक नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं प्रबंधन स्तर पर भी चूक हो रही है।
प्रबंधन पर उठते सवाल लगातार हो रही मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कान्हा प्रबंधन स्थिति को संभालने में विफल हो रहा है विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौतों का कारण संक्रमण है, तो इसका मतलब है कि पार्क के भीतर स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली कमजोर है। वहीं, करंट लगने, आपसी संघर्ष और दुर्घटनाओं जैसी घटनाएं भी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं।सूत्रों के अनुसार, कई मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जमीनी सच्चाई में अंतर देखने को मिला है। यही कारण है कि स्थानीय पत्रकार और सामाजिक संगठन प्रबंधन की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। पत्रकारों का अनिश्चितकालीन धरना बाघों की मौतों को लेकर मंडला जिला मुख्यालय में 5 मई से पत्रकारों द्वारा अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया गया है। यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है।धरने पर बैठे पत्रकारों का कहना है कि जब तक मौतों के वास्तविक कारण सामने नहीं आते और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
पर्यटन पर भी पड़ सकता है असर
कान्हा नेशनल पार्क हर साल हजारों देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करता है, जो यहां बाघों के दीदार के लिए आते हैं। लेकिन लगातार हो रही मौतों की खबरें पर्यटन पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।
यदि यही स्थिति बनी रही, तो न केवल वन्यजीव संरक्षण बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग पर्यटन पर निर्भर हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में बाघों की मौत सामान्य नहीं है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं रोग नियंत्रण में कमी बाघों के बीच बढ़ता संघर्ष मानवीय हस्तक्षेप निगरानी और बचाव तंत्र की कमजोरी विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है।
क्या होनी चाहिए कार्रवाई
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की जरूरत है स्वतंत्र जांच मौतों की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच हो।
स्वास्थ्य निगरानी बाघों की नियमित मेडिकल जांच और ट्रैकिंग।सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना करंट, जाल और अन्य खतरों को खत्म करना।
पारदर्शिता हर घटना की सही और स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक की जाए।
जवाबदेही तय करना लापरवाही पाए जाने पर अधिकारियों पर कार्रवाई।
कान्हा नेशनल पार्क केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की वन्यजीव धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां बाघों की लगातार हो रही मौतें एक चेतावनी हैं।यदि इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। फिलहाल जरूरत है पारदर्शिता, जिम्मेदारी और ठोस कार्रवाई की ताकि “टाइगर स्टेट” कहे जाने वाले मध्यप्रदेश की यह पहचान सुरक्षित रह सके
