जितेन्द्र अलबेला
राजनीति में जब तख्तापलट होता है, तो सिर्फ सत्ता नहीं बदलती, संगठन के भीतर की जमीन भी दरकने लगती है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान हालात कुछ इसी ओर इशारा कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के अध्यक्ष जीतू पटवारी की पुरजोर कोशिशों के बाद भी सूबे में फिलहाल भाजपा विरोधी कोई मजबूत लहर आकार नहीं ले पा रही है। आरोप-प्रत्यारोप और रणनीतिक घेराबंदी के तमाम दांव अब तक उम्मीद के मुताबिक परिणाम देने में नाकाम साबित हुए हैं।
अलादीन का चिराग’ और जमीनी हकीकत
हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार द्वारा मुख्यमंत्री पर जमीन खरीदी को लेकर लगाए गए आरोपों ने कांग्रेस खेमे में हलचल पैदा कर दी थी। प्रदेश नेतृत्व को लगा कि उनके हाथ ‘अलादीन का चिराग’ लग गया है, जिससे सत्ता पक्ष को आसानी से कटघरे में खड़ा किया जा सकेगा।
इस राजनीतिक ‘चिराग’ को पहले भोपाल में घिसा गया, और जब वहां से वांछित माहौल नहीं बना, तो दिल्ली के मंच पर भी ताकत दिखाई गई। लेकिन नतीजों के रूप में कोई बड़ा राजनीतिक लाभ मिलता नहीं दिखा। इस पूरे घटनाक्रम पर रही-सही कसर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के उस बयान ने पूरी कर दी, जिसमें उन्होंने अनौपचारिक रूप से कह दिया कि संभवतः प्रदेश अध्यक्ष को तथ्यों की पूरी जानकारी नहीं थी। वरिष्ठ नेताओं के ऐसे बयान कहीं न कहीं जमीनी स्तर पर नेतृत्व के असमंजस को उजागर करते हैं।
मौन सत्याग्रह और अंदरूनी असंतोष का विस्फोट
जब मीडिया में मुद्दों को अपेक्षित जगह न मिलने की बात सामने आई, तो प्रदेश अध्यक्ष द्वारा तीन दिवसीय ‘मौन सत्याग्रह’ का फरमान जारी किया गया। लेकिन राजनीति में जब नेतृत्व मौन धारण करता है, तो कार्यकर्ताओं की बेचैनी मुखर हो जाती है। इंदौर के कांग्रेस नेता राकेश यादव का गुस्सा इसी का एक उदाहरण माना जा रहा है, जिन्होंने सीधे तौर पर नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा दिए। हालांकि, उन्हें ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही गई है, लेकिन यह घटना संगठन के भीतर सुलग रहे असंतोष को सतह पर ले आई।
एक झटके में बिखरी मेहनत?
पिछले साल बड़े पैमाने पर चलाए गए ‘संगठन सृजन अभियान’ की सफलता पर अब सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिन जिला अध्यक्षों की नियुक्ति खुद पटवारी की सहमति से हुई थी, आज उन्हीं में से कई असमंजस की स्थिति में हैं। वैचारिक स्पष्टता के अभाव में निचले स्तर का कार्यकर्ता खुद को राजनीतिक रूप से असुरक्षित महसूस कर रहा है।
गुटबाजी का पुराना मर्ज: मालवा से विंध्य तक का गणित
कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि यह पार्टी कैडर-बेस्ड से ज्यादा लीडर-बेस्ड रही है। ऐसे में जब तक बड़े क्षत्रप किसी एक चेहरे को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते, तब तक सांगठनिक एकजुटता का दावा खोखला ही रहता है।
मालवा अंचल दिग्विजय सिंह और अरुण यादव जैसे कद्दावर नेताओं की कथित दूरी या नाराजगी का सीधा असर इस पूरे बेल्ट पर दिख रहा है।
विंध्य क्षेत्र अजय सिंह राहुल की नेतृत्व से दूरी के चलते विंध्य में भी कार्यकर्ता खुद को दिशाहीन पा रहे हैं।
महाकौशल छिंदवाड़ा
जो छिंदवाड़ा कभी कांग्रेस का सबसे अभेद्य किला माना जाता था, वहां भी जमीनी पकड़ रखने वाले दिग्गज नेताओं और कार्यकर्ताओं का भाजपा की ओर झुकाव पार्टी के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय बन गया है।
सत्ता की आदत या विपक्ष की भूमिका में कमी?
दशकों तक देश और प्रदेश में शासन करने वाली कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती ‘मजबूत विपक्ष’ की भूमिका को जीने की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता में रहने की आदी हो चुकी पार्टी को सड़क पर उतरकर आक्रामक और दीर्घकालिक विरोध करने का सलीका नए सिरे से सीखना होगा। इस मामले में अक्सर मीनाक्षी नटराजन जैसे नेताओं का उदाहरण दिया जाता है, जिन्होंने मुद्दों पर आधारित संघर्ष की राजनीति की।
निष्कर्ष
जीतू पटवारी के सामने इस समय दोहरी चुनौती है एक तरफ सत्ताधारी दल की घेराबंदी करना और दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं को भरोसे में लेकर बिखरे हुए संगठन को समेटना। यदि समय रहते आंतरिक कलह और कार्यकर्ताओं के पलायन को नहीं रोका गया, तो ‘संगठन सृजन’ की बची-खुची उम्मीदें भी मिट्टी में मिल सकती हैं।
