दैनिक रेवांचल टाइम्स डिंडोरी
भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने किया भ्रमण, कहा— प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने सरकार और समाज दोनों को निभानी होगी जिम्मेदार एक ओर रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से खेती की लागत बढ़ रही है, मिट्टी की उर्वरता घट रही है और मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर डिंडौरी जिले का नर्मदांचल गौ सेवा समिति, ढोंढ़ा में संचालित जैव आदान संसाधन केंद्र (बीआरसी) किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभर रहा है। भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय एवं प्रांतीय पदाधिकारियों ने केंद्र का भ्रमण कर यहां विकसित जैविक खेती के मॉडल को प्राकृतिक कृषि की दिशा में अनुकरणीय पहल बताया।
भारतीय किसान संघ की अखिल भारतीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य श्रीमती गिरजा दीदी, महाकौशल प्रांत संगठन मंत्री श्री तुलाराम, महिला संयोजिका श्रीमती सेवंती बरखानिया तथा नरसिंहपुर जिला प्रचार-प्रसार प्रमुख श्री नितिन तिवारी ने जैव आदान संसाधन केंद्र का निरीक्षण किया। इस दौरान भारतीय किसान संघ के जिलाध्यक्ष एवं जैविक कृषि विशेषज्ञ श्री बिहारी लाल साहू ने अतिथियों को गोबर गैस संयंत्र, जीवामृत निर्माण इकाई, जैविक खाद निर्माण प्रक्रिया तथा प्राकृतिक खेती की उन्नत तकनीकों की विस्तार से जानकारी दी।
श्री बिहारी लाल साहू ने बताया कि गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी से तैयार होने वाला जीवामृत मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ाकर फसलों को प्राकृतिक पोषण देता है। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है। उन्होंने बताया कि गोबर गैस संयंत्र से मिलने वाली गैस घरेलू ईंधन के रूप में उपयोग की जाती है, जबकि बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनकर खेतों में उपयोग होती है, जिससे खेती और पर्यावरण दोनों को लाभ मिलता है।
भ्रमण के दौरान श्रीमती गिरजा दीदी ने कहा कि यदि खेती और मानव जीवन को सुरक्षित रखना है तो प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाना होगा। रासायनिक खेती ने मिट्टी, जल और स्वास्थ्य तीनों को प्रभावित किया है। ऐसे में जैविक खेती ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने किसानों से अधिक से अधिक प्राकृतिक खेती अपनाने और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था विकसित करने का आह्वान किया।
महाकौशल प्रांत संगठन मंत्री श्री तुलाराम ने कहा कि केवल किसानों के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। सरकारों को भी जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार, प्रमाणन और उचित मूल्य की प्रभावी व्यवस्था करनी होगी। जब तक जैविक उत्पादों को बेहतर बाजार नहीं मिलेगा, तब तक प्राकृतिक खेती का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पाएगा।
श्री बिहारी लाल साहू ने बताया कि वे पिछले दस वर्षों से जैविक खेती कर रहे हैं और उनके जैव आदान संसाधन केंद्र में किसानों, विद्यार्थियों, शासकीय अधिकारियों तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां जैविक खेती का लाइव प्रदर्शन भी कराया जाता है, जिससे किसान तकनीकों को देखकर सीखते हैं और अपने खेतों में अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं।
भ्रमण के अंत में अतिथियों ने जैव आदान संसाधन केंद्र की कार्यप्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि यदि ऐसे मॉडल गांव-गांव विकसित किए जाएं तो खेती फिर से लाभकारी, पर्यावरण अनुकूल और स्वास्थ्यवर्धक बन सकती है। डिंडौरी का यह केंद्र आज केवल एक प्रशिक्षण स्थल नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती के नए भारत की मजबूत नींव बनता दिखाई दे रहा है।
