जबलपुर के किसान, घोटाले और सरकारी चुप्पी

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धान का घोटाला खत्म नहीं हुआ, गेहूं का भुगतान अब तक अटका है, और अब मूंग और उड़द का खेल शुरू हो गया है। जगह वही …. जबलपुर ज़िले का भेड़ाघाट इलाका। बसेड़ी सेवा सहकारी समिति का MLT वेयरहाउस। यहां आंकड़ों की बाज़ीगरी से 1600 क्विंटल मूंग और 300 क्विंटल उड़द की “ऑनलाइन फसल” उगा दी गई। ज़मीन पर नहीं, पोर्टल पर। बाज़ार भाव में करीब डेढ़ करोड़ रुपये की यह फसल कभी खेत में बोई ही नहीं गई।


जब फसल खेत में नहीं, पोर्टल पर उगाई जाती है
जांच में पता चला कि जिन किसानों ने कोई उपज नहीं बेची, उनके नाम से स्टॉक दिखाया गया। असली अनाज तो आया ही नहीं, लेकिन सरकारी रजिस्टर और कंप्यूटर पर सब कुछ “ठीक” दर्ज कर दिया गया। अधिकारियों की शुरुआती रिपोर्ट 1900 क्विंटल की हेराफेरी कहती है, लेकिन जानकारों का दावा है …. खेल 3000-3500 क्विंटल का है।

किसानों के नाम पर बिचौलियों का धंधा

बिचौलिये, जिनके पास अनाज नहीं था, उन्होंने भी एंट्री करा दी। अब भरपाई असली किसानों के माल से की जा रही है। नतीजा …. किसानों को भुगतान नहीं मिलेगा, और वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहेंगे। खेत में पसीना बहाने वाले का पसीना सूख जाएगा, लेकिन पोर्टल पर खेल खेलने वालों के चेहरे पर शिकन भी नहीं आएगी।
पहले चेतावनी थी, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं


ये पहला मौका नहीं है। इस केंद्र पर पहले भी “अतिरिक्त स्टॉक” की खबरें आईं। सर्वे करने गए अफसर से मारपीट तक हुई। लेकिन कार्रवाई बस औपचारिक रही …. एक नोटिस, कुछ कागज़, और फाइल बंद।
अब सवाल सिर्फ अनाज के गायब होने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि ऐसे फर्जीवाड़े बिना ऊपरी संरक्षण के कैसे संभव हैं? क्या ऊपरी हाथों ने इसे होने दिया?

और अगर हां, तो फिर यह घोटाला सिर्फ वेयरहाउस का नहीं, पूरे सिस्टम का है।
किसान अब भी अपनी उपज लेकर मंडियों के बाहर खड़ा है, लेकिन वहां अनाज का हिसाब पहले ही “ऑनलाइन” निपटा दिया गया है। खेत में मेहनत, कागज़ पर हेराफेरी, और जनता के बीच गहरी चुप्पी …. यही इस घोटाले की असली फसल है।
रिपोर्ट आरती लोधी

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