युवाओं का भविष्य दांव पर,शिक्षा माफिया सरकार पर हावी
दैनिक रेवाँचल टाईम्स – मध्य प्रदेश में इंजीनियरिंग शिक्षा का संकट गहराता जा रहा है। राज्य भर में सैकड़ों प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो रहे हैं, जबकि ग्रेजुएट इंजीनियरों की बेरोजगारी चरम पर पहुंच चुकी है। युवा अब बैंक क्लर्क, PO, चपरासी और कोर्ट के बाबू जैसे निम्न पदों के लिए आवेदन भर रहे हैं। छात्रों को बेसिक्स तक नहीं आते—सिविल इंजीनियरिंग के विद्यार्थी इंच-फीट कन्वर्जन जैसी सरल बात नहीं जानते। कॉलेज मोटी फीस वसूलते हैं और घर बैठे डिग्री बांट देते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस पूरे सिस्टम की तत्काल जांच करनी चाहिए।
कॉलेज बंदी का तांडव: 200+ संस्थान खत्म
राज्य में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या तेजी से घट रही है। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2026 तक 200 से अधिक कॉलेज बंद हो चुके हैं या अन्य संस्थानों में विलय हो गए हैं। मुख्य कारण कम एडमिशन और घटिया शिक्षा गुणवत्ता है। इंदौर, भोपाल, जबलपुर जैसे शहरों में 50% से ज्यादा कॉलेज आधे क्षमता पर चल रहे हैं। अभिभावक महंगे कोर्स चुनते हैं, लेकिन रिजल्ट निराशाजनक मिलता है। एक सर्वे में सामने आया कि 70% ग्रेजुएट्स को कोर सब्जेक्ट्स के बेसिक्स नहीं आते। उदाहरणस्वरूप, मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र न्यूटन के गति नियम ([F = ma]) तक नहीं समझ पाते।
बेरोजगारी का भयानक ग्राफ:
इंजीनियर चपरासी बनने को मजबूर
मध्य प्रदेश में इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स की बेरोजगारी दर 40% से ऊपर हो चुकी है, जो राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है। NSSO के हालिया डेटा के मुताबिक, 2025 में 1.5 लाख इंजीनियर बेरोजगार घूम रहे हैं। ये युवा अब प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग जॉब्स के बजाय लो-लेवल पद तलाश रहे हैं।
IBPS PO भर्ती 2026 में 5000 से अधिक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स ने आवेदन किया। MP हाईकोर्ट की चपरासी भर्ती (100 पद) के लिए 2000 इंजीनियर्स ने फॉर्म भरे। बैंक क्लर्क एग्जाम में भी यही ट्रेंड दिखा। एक बीटेक ग्रेजुएट, इंदौर के रहने वाले राहुल शर्मा (नाम बदला गया) ने बताया, “4 साल की पढ़ाई और 5 लाख फीस के बाद क्लर्क की नौकरी ही विकल्प बची। कॉलेज ने प्रैक्टिकल नॉलेज ही नहीं दिया।” कोर्ट बाबू भर्ती में भी सैकड़ों इंजीनियर्स लाइन लगा रहे हैं।
बेसिक्स का अंधेरा: इंच-फीट तक नहीं आता ज्ञान इंजीनियरिंग कॉलेजों में बेसिक शिक्षा का अभाव है। सिविल इंजीनियरिंग के छात्रों को इंच-फीट कन्वर्जन तक नहीं आता, जो फाउंडेशन कोर्स का हिस्सा है। इलेक्ट्रिकल स्टूडेंट्स को ओम के नियम ([V = IR]) तक नहीं पता। प्रोफेसरों की कमी और पुराने सिलेबस जिम्मेदार हैं। एक पूर्व फैकल्टी ने कहा, “80% क्लासेस ऑनलाइन होती हैं, लैब में मशीनें खराब पड़ी रहती हैं।” फिर भी, सालाना फीस 1 से 2 लाख तक वसूली जाती है। RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, कई कॉलेज 90% छात्रों को बिना एग्जाम पास कर देते हैं।
घर बैठे डिग्री का घोटाला: ऑनलाइन का दुरुपयोग
कोविड के बाद ऑनलाइन मोड का दुरुपयोग हो रहा है। छात्र घर बैठे असाइनमेंट सबमिट कर डिग्री ले लेते हैं। भोपाल के एक कॉलेज में जांच में पाया गया कि 60% छात्रों ने कभी कैंपस नहीं देखा। UGC और AICTE की गाइडलाइंस का उल्लंघन हो रहा है। अभिभावक फीस भरते हैं, लेकिन डिग्री बाजार में बेकार साबित हो रही है। इंटरव्यू में कंपनियां बेसिक टेस्ट लेती हैं, जहां 90% फेल हो जाते हैं। छात्र संगठन ABVP ने शिक्षा मंत्री को ज्ञापन सौंपा, जिसमें 100 कॉलेजों पर कार्रवाई की मांग की गई।
सरकार जागे: जांच और सुधार की मांग
विशेषज्ञ सरकार से मांग कर रहे हैं कि सभी 500+ इंजीनियरिंग कॉलेजों का ऑडिट कराया जाए। फेक डिग्री पर FIR दर्ज हो। स्किल इंडिया से लिंक कर नया करिकुलम लागू हो, जिसमें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग अनिवार्य हो। इंजीनियरिंग जॉब पोर्टल बनाकर प्लेसमेंट सुधारा जाए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यालय ने कहा, “मामले की जानकारी ली जा रही है, जल्द एक्शन होगा।” लेकिन युवाओं का धैर्य जवाब दे रहा है। अगर जांच नहीं हुई, तो मध्य प्रदेश का टेक्निकल सेक्टर पूरी तरह ढह जाएगा। छात्र आंदोलन की तैयारी में हैं।
चेतावनी: लाखों परिवारों की उम्मीदें टूटेंगी
यह संकट सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि पूरे राज्य के विकास का है। लाखों परिवारों की उम्मीदें टूट रही हैं। सरकार को तुरंत हाई-लेवल कमिटी गठित करनी चाहिए। वरना, इंजीनियरिंग डिग्री ‘पेपर डिग्री’ बनकर रह जाएगी।
(स्रोत: AICTE रिपोर्ट, NSSO डेटा, छात्र साक्षात्कार, RTI जानकारी।)
