
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला
मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में जहां किसानों को खाद-बीज जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए सरकारी तंत्र पर निर्भर रहना पड़ता है, वहीं अब वही तंत्र सवालों के घेरे में है।
कृषि विभाग के प्रभारी उप संचालक अश्वनी झारिया के कारनामे से मंडला तो मंडला डिंडोरी जिले में भी आज भी चर्चे चलते है क्योंकि इन्होंने जो आदिवासी जिले में ग्रामीण किसानों के साथ किया है वह तो चर्चा नही बल्कि इन्हें भ्रष्टाचार ग़बन घोटाले में आवर्ड से सम्मानित किया जाना चाहिए और डिंडौरी जिले में इनकी जांच आर्थिक अपराध अंबेषण ब्यूरो जबलपुर में चल रही है वावजूद इसके इनमें कोई सुधार नही देखने को मिल रहा बल्कि डिंडौरी जिले से ज्यादा तेजी से कार्य मंडला जिले में आते ही शुर कर दिए और खुद तो खुद अब अपने ड्राइवर से तक वसूली करवा रहे है जिसकी ऑडियो तेजी से सोशल मीडिया वायरल हुई और ड्राइवर से जुड़ा कथित वायरल ऑडियो पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है—लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जांच टीम कर क्या रही है?
जांच या ‘मैनेजमेंट’?
वायरल ऑडियो सामने आए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक:
न कोई स्पष्ट जांच रिपोर्ट, न कोई ठोस कार्रवाई, न ही विभाग की तरफ से पारदर्शी बयान, ऐसे में यह शंका और गहराती है कि कहीं जांच के नाम पर मामले को दबाने की कोशिश तो नहीं हो रही?
ऑडियो में क्या है—और क्यों गंभीर है मामला?
ऑडियो में कथित तौर पर खाद-बीज व्यापारियों से “कार्रवाई से बचाने” के नाम पर पैसों की बातचीत सामने आई है। रकम की मोलभाव जैसी बातें इस ओर इशारा करती हैं कि
यह कोई एक दिन का खेल नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक वसूली का हिस्सा हो सकता है।
अगर यह सच है, तो यह सिर्फ एक ड्राइवर की हरकत नहीं, बल्कि पूरे विभागीय ढांचे पर सवाल है।
“ड्राइवर ही क्यों?”—बड़ा सवाल
सबसे अहम सवाल—
क्या एक ड्राइवर अपने स्तर पर यह सब कर सकता है?
या फिर वह किसी बड़े संरक्षण में काम कर रहा था?
जब बातचीत में “साहब” का जिक्र आता है, तो जांच की दिशा सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रखना अपने आप में संदेह पैदा करता है।
आदिवासी जिले में योजनाओं पर डाका?
मंडला में किसानों के लिए आने वाली योजनाएं पहले ही सवालों में रही हैं।
खाद-बीज वितरण में गड़बड़ी
दुकानदारों पर दबाव, कार्रवाई के नाम पर वसूली के ऐसे आरोप पहले भी उठते रहे हैं। अब यह ऑडियो सामने आने के बाद यह साफ दिख रहा है कि
योजनाओं की आड़ में लूट का खेल चल रहा है और जांच के नाम पर जनता को सिर्फ “झुनझुना” पकड़ा दिया जाता है।
जांच टीम भी संदेह के घेरे में
अगर जांच टीम सच में गंभीर होती, तो अब तक:
संबंधित लोगों के बयान सामने आते
ऑडियो की फॉरेंसिक जांच शुरू होती
जिम्मेदारों पर प्राथमिक कार्रवाई होती
लेकिन चुप्पी ही सबसे बड़ा संकेत है कि मामला कहीं “सेटल” करने की कोशिश तो नहीं।
अब क्या होना चाहिए?
स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच
ऑडियो की फॉरेंसिक पुष्टि
उच्च अधिकारियों की भूमिका की जांच
दोषियों पर कठोर कार्रवाई
वही यह मामला सिर्फ एक वायरल ऑडियो का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जो किसानों के नाम पर चल रहा है।
अगर इस बार भी जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रही, तो यह साफ होगा कि मंडला में भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था बन चुका है।
