कान्हा में फिर बाघ की मौत, सवालों के घेरे में प्रबंधन

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
विश्व प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व में एक बार फिर बाघ की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भीषण गर्मी, लगातार हो रही वन्यजीव घटनाओं और निगरानी व्यवस्था की पोल खोलती इस घटना ने कान्हा प्रबंधन की कार्यशैली को कटघरे में ला खड़ा किया है।


प्राप्त जानकारी के अनुसार दिनांक 19 मई 2026 को कान्हा टाइगर रिजर्व के मुक्की परिक्षेत्र अंतर्गत बीट मोहगांव के कक्ष क्रमांक 156 में गश्ती दल को एक नर बाघ मृत अवस्था में मिला। बताया गया कि सुबह क्षेत्र संचालक, उप संचालक एवं वन्यजीव स्वास्थ्य अधिकारी घायल एवं अस्वस्थ बाघ की सूचना के बाद क्षेत्र में अनुश्रवण कर रहे थे, लेकिन कुछ ही समय बाद बाघ मृत पाया गया।


सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब बाघ पहले से घायल और अस्वस्थ था तो उसे समय रहते उपचार और सुरक्षा क्यों नहीं मिल सकी? क्या निगरानी तंत्र केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित रह गया है? जंगल में लगातार गश्त और आधुनिक मॉनिटरिंग के दावे करने वाला प्रबंधन आखिर इस बाघ को बचाने में क्यों असफल रहा?


पोस्टमार्टम में बाघ की आयु लगभग 5 से 6 वर्ष बताई गई है। चिकित्सकों के अनुसार उसके शरीर पर चोट के निशान और फेफड़ों में संक्रमण पाया गया। हालांकि विभाग इसे प्राकृतिक या आपसी संघर्ष का मामला बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि कान्हा में लगातार हो रही बाघों की मौतें गंभीर लापरवाही का संकेत हैं।


यह भी चिंता का विषय है कि देश-दुनिया में अपनी बाघ संरक्षण प्रणाली के लिए पहचान रखने वाला कान्हा अब लगातार सवालों में घिरता जा रहा है।

एक ओर सरकार करोड़ों रुपये वन्यजीव संरक्षण पर खर्च करने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर घायल बाघ समय पर इलाज और निगरानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं।


घटना के बाद एनटीसीए प्रोटोकॉल के तहत पोस्टमार्टम और भस्मीकरण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। विभाग ने डॉग स्क्वॉड से जांच कराने और फॉरेंसिक सैंपल लेने की बात कही है, लेकिन लोगों का कहना है कि हर घटना के बाद केवल जांच और औपचारिक बयान सामने आते हैं, जिम्मेदारी तय नहीं होती।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जंगलों में नियमित स्वास्थ्य मॉनिटरिंग, त्वरित रेस्क्यू सिस्टम और संवेदनशील निगरानी व्यवस्था मजबूत होती तो शायद इस बाघ की जान बचाई जा सकती थी।


अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर कान्हा में लगातार हो रही बाघों की मौतों के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल पोस्टमार्टम और भस्मीकरण कर देने से वन विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा, या फिर इस बार किसी की जवाबदेही भी तय होगी?

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