ब्लड ग्रुप में गंभीर लापरवाही से खुली निजी अस्पतालों की पोल, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
जिले में निजी अस्पतालों की मनमानी और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मरीजों की जिंदगी से हो रहे खिलवाड़ का एक और गंभीर मामला सामने आया है। इस बार मामला ब्लड ग्रुप जैसी जीवनरक्षक जांच में कथित भारी लापरवाही का है, जिसने पूरे निजी स्वास्थ्य तंत्र और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार मरीज सतीश यादव की जांच के दौरान जबलपुर में संचालित निजी अस्पताल शीतल छाया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा जारी रिपोर्ट में ब्लड ग्रुप “AB Positive” बताया गया और उसी आधार पर ब्लड की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए। लेकिन परिजनों को संदेह होने पर जब अन्य पैथोलॉजी लैब में दोबारा जांच कराई गई तो लगातार “O Positive” रिपोर्ट सामने आई।



सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ब्लड ग्रुप जैसी संवेदनशील जांच में इतनी बड़ी गलती कैसे हो सकती है? यदि परिजन दोबारा जांच नहीं कराते और गलत ब्लड मरीज को चढ़ा दिया जाता, तो उसकी जान तक जा सकती थी। क्या निजी अस्पताल अब इलाज के नाम पर मरीजों को प्रयोगशाला का साधन बना चुके हैं?
“जिंदगी से बड़ा पैसा?”
मामले में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। अस्पताल प्रबंधन द्वारा परिजनों को बंसल ब्लड बैंक भेजा गया, जहां केवल ब्लड ग्रुप जांच के नाम पर लगभग ₹600 वसूले गए। जबकि अन्य पैथोलॉजी लैब में यही जांच करीब ₹100 में हुई और वहां सही रिपोर्ट सामने आई।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या मरीजों को जानबूझकर निजी ब्लड बैंक और जांच केंद्रों की ओर भेजकर आर्थिक शोषण किया जा रहा है? क्या अस्पताल और निजी जांच केंद्रों के बीच कोई सांठगांठ चल रही है?
जिला प्रशासन आखिर मौन क्यों?
वही जिले में सैकड़ो की संख्या में वर्षों से निजी अस्पतालों, अवैध क्लीनिकों और मनमाने जांच केंद्रों की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित दिखाई देती है।
आरोप लग रहे हैं कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की ढीली निगरानी के कारण निजी अस्पतालों के हौसले बुलंद हैं। बिना प्रभावी जांच और जवाबदेही के मरीजों से मनमानी फीस वसूली जा रही है और गलत रिपोर्ट देकर उनकी जान तक जोखिम में डाली जा रही है।
और यहाँ तक कि जब तक मरीज़ो के परिजनो के पास पैसा है तब तक ईलाज करते है जैसे ही पैसा खत्म इलाज खत्म मानवता नाम की कोई भी चीज चिकित्सकों और चिकित्सालय में देखने को नही मिल रही है केवल और केवल इलाज के नाम पर लूट मची हुई है और जिम्मेदार हाथ पे हाथ सब मौन साधे देख रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल कलेक्टर, सीएमएचओ और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों पर उठ रहा है कि आखिर जिले में निजी अस्पतालों की नियमित जांच क्यों नहीं हो रही? क्या प्रशासन केवल शिकायत होने के बाद औपचारिक कार्रवाई करने तक सीमित रह गया है?
“मरीज नहीं, कमाई का जरिया बन चुके अस्पताल?”
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिले में कई निजी अस्पताल मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर इलाज के नाम पर खुली लूट चला रहे हैं। जांच, दवाइयों और ब्लड जैसी जरूरी सेवाओं में भारी कमीशनखोरी और मनमाना शुल्क वसूले जाने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।
लेकिन दुखद स्थिति यह है कि जब मामला सीधे मरीज की जान से जुड़ा हो, तब भी जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी समझ से परे है। यदि इस मामले में समय रहते सच्चाई सामने नहीं आती, तो एक बड़ी अनहोनी भी हो सकती थी।
अब उठ रही निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
मरीज के परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार डॉक्टरों और कर्मचारियों पर कार्रवाई तथा गलत रिपोर्ट और अत्यधिक शुल्क वसूली की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम लगेगी, या फिर पैसों के खेल में मरीजों की जिंदगी यूं ही दांव पर लगती रहेगी?
