भूख, बदहाली और भरोसे का जूस, तीन दिन तक चली हड़ताल ने नगर निगम की ‘कुंभकर्णी व्यवस्था’ को जगाया

Revanchal
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वादों के सहारे टूटा अनशन

जबलपुर के डॉ. जाकिर हुसैन वार्ड में पिछले तीन दिनों से सिर्फ एक पार्षद भूखी नहीं बैठी थी… भूखा था पूरा इलाका।
भूखी थीं वो गलियां, जहां नालियां बजबजा रही हैं।
प्यासे थे वो घर, जहां नर्मदा पाइपलाइन का सपना हर चुनाव में आता है और हर बार फाइलों में सूख जाता है।


और सबसे ज्यादा भूखी थी जनता…उस भरोसे की, जो नगर निगम हर बार भाषणों में परोस देता है।

वार्ड क्रमांक 40 की पार्षद मुकिमा याकूब अंसारी की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आखिर तीसरे दिन समाप्त हो गई। लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है…क्या यह जीत जनता की है, या फिर वही पुराना सरकारी फार्मूला… आश्वासन पिलाओ और आंदोलन खत्म कराओ?

दमोह नाका स्थित नगर निगम जोन कार्यालय के बाहर तीन दिन तक चली इस हड़ताल ने नगर निगम प्रशासन की उस नींद को तोड़ा, जिसे खुद पार्षद ने कुंभकर्णी नींद कहा।


पहले दिन से ही निगम के अधिकारी समझाने में लगे रहे। अपर आयुक्त चौहान, कार्यपालन यंत्री कमलेश श्रीवास्तव, जल विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पीडब्ल्यूडी और सीएसआई तक धरना स्थल पहुंचे। लगभग डेढ़ घंटे तक मान-मनौव्वल चलता रहा। लेकिन पार्षद का जवाब साफ था…
अगर जनता की समस्या के लिए जान भी देनी पड़े, तो पीछे नहीं हटेंगे।

स्थिति उस वक्त और गंभीर हो गई जब पार्षद ने घोषणा कर दी कि यदि 24 घंटे में मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे जल ग्रहण भी छोड़ देंगी।
यानी राजनीति अब प्रेस नोट से निकलकर शरीर की लड़ाई में बदल चुकी थी।

दरअसल मामला सिर्फ सड़क, नाली और पानी का नहीं था। यह उस उपेक्षा का मामला था, जो शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों की किस्मत में जैसे स्थायी रूप से लिख दी गई है।


15 सूत्रीय मांगों में गोहलपुर क्षेत्र में सामुदायिक भवन निर्माण, शासकीय उर्दू शाला, दारुल उलूम से चार खंभा तक सड़क और नाला निर्माण, नए बोरवेल, और मोमिनपुरा तलैया तक नर्मदा पाइपलाइन जैसी मूलभूत मांगें शामिल थीं।
यानी जनता कोई मॉल नहीं मांग रही थी… सिर्फ जीने लायक सुविधाएं मांग रही थी।

तीसरे दिन जब पूर्व क्षेत्र विधायक लखन घनघोरिया, नेता प्रतिपक्ष अमरीश मिश्रा और कांग्रेस पार्षद दल मौके पर पहुंचा, तब जाकर प्रशासनिक मशीनरी ने तेजी दिखाई। बैठक हुई, चर्चाएं हुईं, सहमतियां बनीं और आखिरकार जूस का गिलास सामने आया।
नगर निगम ने अधिकांश मांगों पर सहमति जताई और राज्य शासन से जुड़ी मांगों को आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया।

फिर वही तस्वीर बनी, जो हिंदुस्तानी राजनीति में अक्सर बनती है…
एक तरफ भूख से कमजोर पड़ा जनप्रतिनिधि… दूसरी तरफ कैमरों के सामने जूस पिलाते नेता और अधिकारी।

हड़ताल खत्म हो गई।
लेकिन असली सवाल अब शुरू होता है।

क्या दारुल उलूम से मोमिनपुरा तक पाइपलाइन सच में बिछेगी?
क्या गोहलपुर को उसका सामुदायिक भवन मिलेगा?
क्या उर्दू स्कूल सिर्फ फाइल में नहीं, जमीन पर भी बनेगा?
या फिर यह आंदोलन भी सरकारी आश्वासनों की कब्र में दफन हो जाएगा?

जबलपुर की राजनीति में यह घटना सिर्फ एक भूख हड़ताल नहीं थी।
यह उस शहर का आईना थी, जहां जनता को मूलभूत सुविधाओं के लिए भी अपने प्रतिनिधियों को भूखा बैठाना पड़ता है।

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