मंडला में सूखते स्रोत, सिस्टम के दावे बेनकाब!
गहरीकरण अधूरा, कुएं-तालाब उपेक्षित, नए जल स्रोत नदारद—दूसरे चरण में भी वही पुरानी लापरवाही, जांच की मांग तेज
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। मध्य प्रदेश के मंडला जिले में जल संरक्षण के नाम पर चलाया जा रहा “जल गंगा संवर्धन अभियान” अब एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। शासन द्वारा बड़े स्तर पर प्रचारित इस महत्वाकांक्षी योजना का जमीनी सच चौंकाने वाला है—जहां कागजों में विकास की लंबी-चौड़ी कहानी लिखी जा रही है, वहीं धरातल पर सूखे हालात और बदहाल जल स्रोत वास्तविकता बयां कर रहे हैं। दूसरे चरण में भी अभियान की रफ्तार और प्रभाव उतना ही कमजोर दिख रहा है, जितना पहले दौर में था।
कागजों में गहरीकरण, जमीन पर जस का तस हाल
अभियान के तहत शासकीय तालाबों के गहरीकरण और पुनर्जीवन का दावा किया गया था, लेकिन जिले के कई हिस्सों में यह कार्य या तो शुरू ही नहीं हुआ या आधा-अधूरा छोड़ दिया गया। कई तालाबों में केवल औपचारिक रूप से मिट्टी हटाकर काम पूरा दिखा दिया गया, जबकि वास्तविक गहरीकरण नहीं हुआ। परिणामस्वरूप गर्मी बढ़ते ही तालाब सूखने लगे हैं और पानी का संकट पहले जैसा ही बना हुआ है।
नए जल स्रोतों का निर्माण ठप
योजना के दूसरे अहम हिस्से—नए जल स्रोतों के निर्माण—की स्थिति भी निराशाजनक है। जिन गांवों में जल संकट अधिक है, वहां कोई ठोस पहल नजर नहीं आती। न तो नए कुएं बनाए जा रहे हैं और न ही जल संचयन के स्थायी ढांचे विकसित किए जा रहे हैं। इससे साफ है कि योजना की प्राथमिकताएं जमीनी जरूरतों से मेल नहीं खा रहीं।
कुएं-तालाब उपेक्षित, सफाई और मरम्मत शून्य
ग्रामीण क्षेत्रों में शासकीय कुओं और पुराने जल स्रोतों की हालत बदतर है। न नियमित सफाई हो रही है, न मरम्मत। कई कुएं कचरे और गाद से पटे पड़े हैं, जिससे उनका उपयोग लगभग खत्म हो चुका है। तालाबों की पाल टूट चुकी है, जल आवक के मार्ग बंद हैं, और जल निकासी की व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं की गई। ऐसे में जल संरक्षण का पूरा तंत्र ही विफल नजर आता है।
औपचारिकता में सिमटा अभियान
स्थानीय लोगों का आरोप है कि “जल गंगा संवर्धन अभियान” केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। विभागीय स्तर पर कागजी रिपोर्ट तैयार कर सफलता के दावे किए जा रहे हैं, जबकि फील्ड में काम नगण्य है। कई जगहों पर फोटो खिंचवाकर और फाइलें पूरी कर अभियान को सफल बताया जा रहा है। यह स्थिति न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि जनता के साथ सीधा छल भी है।
जिम्मेदारों की उदासीनता, निगरानी कमजोर
अभियान की विफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित विभागों की उदासीनता बताई जा रही है। निगरानी तंत्र कमजोर है और फील्ड स्तर पर कार्यों की नियमित जांच नहीं हो रही। जहां जांच होती भी है, वहां पहले से सूचना पहुंचने की शिकायतें हैं, जिससे वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती। नतीजतन, लापरवाही पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही।
ग्रामीणों में बढ़ता आक्रोश
जल संकट से जूझ रहे ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। उनका कहना है कि हर साल योजनाओं के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन गर्मी आते ही हालात जस के तस हो जाते हैं। पीने के पानी से लेकर सिंचाई तक, हर स्तर पर समस्या बनी रहती है। ऐसे में “जल गंगा संवर्धन अभियान” उनके लिए महज एक दिखावा बनकर रह गया है।
विकास की मुख्यधारा से पिछड़ता मंडला
जल जैसी बुनियादी जरूरत पर प्रभावी काम न होने से मंडला जिला विकास की मुख्यधारा से पिछड़ता नजर आ रहा है। कृषि, पशुपालन और ग्रामीण जीवन—तीनों ही जल पर निर्भर हैं। जब जल स्रोत ही मजबूत नहीं होंगे, तो आर्थिक और सामाजिक विकास की रफ्तार कैसे बढ़ेगी? यह सवाल अब आम चर्चा का विषय बन चुका है।
