नर्मदा तट पर शराबबंदी के आदेशों का क्या हुआ? आखिर किसके संरक्षण में घर-घर पहुंच रही शराब
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला।
मंडला, जिसे मां नर्मदा की पवित्र नगरी के रूप में जाना जाता है, वहां दिनदहाड़े शराब का परिवहन अब आम बात बनता जा रहा है। मंगलवार दोपहर 12 बजे के आसपास उपनगरीय क्षेत्र के पुरवा की और रामबाग के पास आचानक से एक टू व्हीलर वाहन अनियंत्रित होकर सड़क में लुढ़क गया लुढ़कने से जुपिटर स्कुटी क्रमांक MP 51 ZE 0391 में रखी शराब सड़क में बिखर गई और काँच की बोतलें फुट गई सड़क में शराब और काँच के टुकड़े विखर गए मंडला में किस किस माध्यम से शराब लाई जा रही यह सरेआम देखा जा सकता है सड़क में पड़ी स्कूटी ओर चालक को आवागमन करने वाले लोगो ने बीच सड़क से उठा कर किनारे कर अवरुद्ध आवागमन को सुचारू किया गया,
वही एक दोपहिया वाहन शराब ले जाते समय असंतुलित होकर गिर गया। सड़क पर बिखरी शराब की बोतलों को देखकर राहगीरों की भीड़ लग गई। इस घटना ने आबकारी विभाग और पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फोटो में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि सड़क पर टूटी बोतलों के अवशेष पड़े हैं और एक स्कूटर सड़क किनारे खड़ा है, जिसके पास लोग एकत्र हैं। यदि यह शराब का वैध परिवहन था, तो क्या निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा था? और यदि अवैध था, तो जिम्मेदार विभागों की नजर इससे कैसे चूक गई?
क्या कागजों में ही सिमट गई नर्मदा तट की शराबबंदी?
तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मां नर्मदा को जीवित इकाई का दर्जा देते हुए अमरकंटक से अलीराजपुर तक नर्मदा तट के दोनों ओर पांच किलोमीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था। उद्देश्य था नर्मदा तट की पवित्रता और सामाजिक वातावरण को सुरक्षित रखना।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आदेश अब सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित रह गया है? मंडला नगर और उपनगरीय क्षेत्र महाराजपुर में खुलेआम शराब की आवाजाही और कथित अवैध बिक्री इस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है।
राजस्व बढ़ाने की होड़ में जनहित पीछे?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि लाइसेंसी दुकानों से दोपहिया और चारपहिया वाहनों के जरिए शराब शहर और आसपास के क्षेत्रों में पहुंचाई जा रही है। आरोप यह भी हैं कि कई स्थानों पर घरों, ढाबों और गलियों में शराब की बिक्री हो रही है, लेकिन प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती।
यदि ये आरोप सही हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आबकारी विभाग और पुलिस की निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही है?
सूचना पहले, कार्रवाई बाद में?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद कार्रवाई औपचारिकता बनकर रह जाती है। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कार्रवाई से पहले ही संबंधित लोगों तक सूचना पहुंच जाती है और मौके पर पहुंचने तक सबूत गायब हो जाते हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना शेष है।
जवाबदेही तय होगी या फिर एक और मामला ठंडे बस्ते में जाएगा?
शराब से जुड़े अपराध, सड़क दुर्घटनाएं और पारिवारिक हिंसा जैसी घटनाएं लगातार चिंता का विषय हैं। ऐसे में दिनदहाड़े शराब की खेप का सड़क पर बिखर जाना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर बड़ा सवाल है।
अब जिला प्रशासन, पुलिस अधीक्षक और आबकारी विभाग को स्पष्ट करना चाहिए—
क्या यह शराब वैध रूप से परिवहन की जा रही थी?
यदि हां, तो परिवहन के नियमों का पालन क्यों नहीं हुआ?
यदि नहीं, तो जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होगी?
और सबसे महत्वपूर्ण, नर्मदा तट क्षेत्र में शराबबंदी के आदेशों का पालन आखिर कौन सुनिश्चित करेगा?
जब कानून का डर खत्म होने लगे और कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाए, तब अवैध कारोबार करने वालों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है। अब जनता को आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई का इंतजार है।
