जनपद पंचायत मोहगांव में सरकारी राशि का बंदरबाट

Revanchal
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चाबी पंचायत ने बनाया हवा में बना गया खेत तालाब

दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/ मंडला जिले में जो न हो सो कम है आदीवासी बाहुल्य, पिछड़ेपन और आम जनता में शिक्षा के साथ ही साथ जागरूकता की कमी का फायदा उठाते हुए इस जिले के अधिकारी और कर्मचारी आम जनता को शासन से मिलने वाली योजनाओं और उसके लाभ को बंदरबाट करने से पीछे नहीं हटते। ऐसा ही एक मामला जनपद पंचायत मोहगांव के अंतर्गत आने वाली चाबी पंचायत का है जहां पर जिम्मेदारों ने जमीन में पानी का संचय करने वाली योजना खेत तालाब को हवा में ही बना दिया।


जी हां सही पढ़ा आपने उक्त मामला चाबी पंचायत के अंतर्गत सरपंच के बगली मोहल्ले का है जहां पर पंचायत के सरपंच भाई को खेत तालाब का लाभ दिया गया हैं। तालाब की लागत करीब चार से साढ़े चार लाख रुपए की हैं, खेत तालाब के लिए हितग्राही के साथ ही पंचायत कर्मचारियों और अधिकारियों ने हितग्राही की जिस जमीन का चयन किया उसका उक्त खसरा नम्बर.. 85/2 जिसका कुल रकबा 0.29 हेक्टेयर सेवकराम धुर्वे पिता देवी सिंह धुर्वे के नाम से राजस्व विभाग में दर्ज है। उक्त जमीन हितग्राही के साथ ही साथ पंचायत विभाग ने और सक्षम अधिकारियों ने चयन किया था। पंरतु इससे भी जायदा हास्यास्पद बात यह हे कि मौके पर हितग्राही सेवाकराम धुर्वे की खसरा नम्बर 85/2 कुल रकबा 0.29 हेक्टेयर पर पंचायत कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा बनाया ही नहीं गया।
तो फिर सवाल यह खड़ा होता हे कि करीब 4 लाख रुपए से जायदा की सरकारी राशि जो हितग्राही के नाम से जारी की गई थी और पंचायत कर्मचारीयों के साथ ही साथ उपयंत्री के साथ अन्य सक्षम अधिकारियों ने उक्त सरकारी पैसों से खेत तालाब का निर्माण कार्य कहा पर करवा दिया गया। और खेत तालाब के निर्माण कार्य में लिए गए मजदूरी का भुगतान आखिर किसके खाते पर डाल दी गई यह एक जांच का विषय बनता हैं।

वही जब इस बात की जानकारी चाबी के सरपंच गया प्रसाद मरावी से ली गई तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा यहां पर सब कुछ संभव है। यह कोई नई बात नहीं हे जमीन कही और की निर्माण कार्य कही और पर इसमें कौन सी नई बात हैं। यहां पर यह सब होता रहता हैं, तो फिर क्या इसके पहले भी मनरेगा का कार्य करवाने वाले रोजगार सहायक के द्वारा और अन्य पंचायत सक्षम अधिकारियों के द्वारा बहुत पहले से ही ये सब खेल खेला जा रहा हैं।

वही जहां पर हितग्राही कोई और खसरा किसी और का और तालाब जमीन पर न बन कर हवा में बना दिया जाता हैं। सरकार कहती हैं पानी बचाना है, भविष्य संवारना है… लेकिन यहां तो पानी से पहले ही तालाब “गायब” हो गया। योजना बनी, पैसा पास हुआ, मजदूरी निकली… बस रह गया तो वो तालाब, जो जमीन पर उतरने से पहले ही हवा में तैर गया।

यह मामला सिर्फ एक तालाब का नहीं है, यह उस भरोसे का है जो आम जनता सरकार की योजनाओं पर करती है। जब वही भरोसा कागज़ों में दफन हो जाए, तो फिर विकास भी सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाता है।

“मंडला में अब पानी बचाने की नई तकनीक आई है—तालाब जमीन पर नहीं, सीधे हवा में बनाए जा रहे हैं, ताकि सूखा कभी असर ही न करे!”

क्या कहते हैं जिम्मेदार..

मुझे इस विषय की कोई जानकारी नहीं है और अगर यह बात सही हैं कि जिस जमीन पर तालाब का निर्माण कार्य किया जाना था वहां पर खेत तालाब नहीं हैं तो इसकी जांच की जायेगी आखिर तालाब कहा पर बनाया गया। और उक्त सरकारी राशि कहा पर दुरुपयोग की गई।
श्रीमाति आशा डहरिया
एपीओ मोहगांव मंडला

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