311 दुकानों का मामला अभी उच्च न्यायालय में, फिर किसके इशारे पर सरकारी जमीन पर उगने लगीं दुकानें? नैनपुर नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

Revanchal
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RTI के दस्तावेज़ों ने खोली परतें, कार्रवाई के बाद फिर शुरू हुआ कथित अतिक्रमण का खेल!

क्या सरकारी भूमि पर कब्जे का खुला लाइसेंस बांट रहा है नगर पालिका प्रशासन?

दैनिक रेवांचल टाइम्स – नैनपुर, मंडला।
नैनपुर नगर में 311 दुकानों के बहुचर्चित अतिक्रमण का मामला अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ है। मामला माननीय उच्च न्यायालय, जबलपुर तक पहुंच चुका है, पूर्व में प्रशासन द्वारा कई दुकानों पर कार्रवाई भी की जा चुकी है और कुछ अवैध निर्माण हटाए भी गए थे। इसके बावजूद अब बीच बाजार में फिर से कथित रूप से सरकारी भूमि पर नए निर्माण शुरू होने से नगर पालिका प्रशासन की कार्यशैली कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है।


दैनिक रेवांचल टाइम्स को सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त दस्तावेज़ों में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे यह सवाल और गहरा हो गया है कि जब मामला न्यायिक प्रक्रिया में है, तब आखिर किसके संरक्षण में सरकारी भूमि पर फिर निर्माण होने दिया जा रहा है? यदि निर्माण वैध है तो उसकी लिखित अनुमति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही, और यदि अवैध है तो उसे तत्काल रोका क्यों नहीं जा रहा?


क्या मौखिक अनुमति से बांटी जा रही सरकारी जमीन?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली दुकानदारों को कथित रूप से नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों की मौखिक सहमति देकर निर्माण कराया जा रहा है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा के प्रति गंभीर उदासीनता का विषय है


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अतिक्रमण को पहले अवैध मानकर हटाया गया था, वही निर्माण अब दोबारा किस नियम के तहत होने दिया जा रहा है?
जेसीबी चलती रही… जिम्मेदारों की आंखें बंद रहीं
बीच बाजार में निर्माण कार्य चलता रहा, जेसीबी से खुदाई होती रही, निर्माण सामग्री पहुंचती रही, लेकिन नगर पालिका और स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई प्रभावी रोक नहीं लगाई गई। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या कुछ लोगों को नियमों से ऊपर मान लिया गया है?


निजी स्वार्थ के आगे बौनी पड़ गई सरकारी जिम्मेदारी?
सरकारी भूमि जनता की संपत्ति होती है, किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि की निजी जागीर नहीं। यदि सरकारी भूमि पर कथित रूप से निजी स्वार्थ के लिए कब्जे हो रहे हैं और जिम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, तो यह केवल नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर प्रश्नचिन्ह है।


उच्च न्यायालय में मामला, फिर भी नहीं सबक?
जब 311 दुकानों का विवाद न्यायालय तक पहुंच चुका है और पूर्व में प्रशासन स्वयं कार्रवाई कर चुका है, तब वर्तमान कथित निर्माणों को रोकने में इतनी ढिलाई क्यों? क्या प्रशासन किसी नए विवाद को जन्म देना चाहता है? क्या भविष्य में फिर सरकारी मशीनरी को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करनी पड़ेगी?


जनता पूछ रही है…
जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है तो नए निर्माण किस आधार पर हो रहे हैं?
कथित मौखिक अनुमति देने का अधिकार किस अधिकारी के पास है?
क्या नगर पालिका लिखित अनुमति और अभिलेख सार्वजनिक करेगी?
क्या जिला प्रशासन पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करेगा?


जिला प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
नगरवासियों ने कलेक्टर एवं जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, RTI से प्राप्त दस्तावेज़ों, भूमि अभिलेखों एवं निर्माण स्वीकृतियों का परीक्षण कराया जाए तथा यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध बिना किसी दबाव के वैधानिक कार्रवाई की जाए। साथ ही बाजार क्षेत्र में सरकारी भूमि पर हुए सभी निर्माणों का पुनः सर्वे कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए।


इनका कहना है कि…..
नैनपुर नगर के अंदर और नगर पालिका कार्यालय के आसपास, बस स्टैंड, वसुरी वादन, बाजार, में शासकीय भूमि में अतिक्रमण कर 311 दुकानें संचालित है और उन्हें हटाने नगर पालिका से अनेको बार नोटिश दिया जा रहा है, वही दूसरी ओर कुछ दुकानें राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते पक्की भी बन गई ये समझ मे नही आ रहा है कि जिले की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था मुँह देखी क्यों कि जा रही गरीबों की दुकानों में बुलडोजर चल जाता है और बड़े रसूखदारों को मौखिक अनुमति दी जाती है और उनकी दुकाने पक्की बन जाती हैं, ये भूमि वाला सालों से विवाद चल रहा है पर कही न कही नगर पालिका इसके पीछे जिम्मेदार है जो सब जानकर भी चुप बैठे हुए हैं।


स्थानीय नागरिक नैनपुर मंडला

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