सूचना अधिकार अधिनियम को दिखाया ठेंगा, आदेश के बाद भी नहीं दी जानकारी — आखिर कौन सा राज़ छुपा रहा विभाग?
दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला। आदिवासी विकास और शिक्षा व्यवस्था की निगरानी करने वाला सहायक आयुक्त कार्यालय इन दिनों खुद पारदर्शिता के कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। हालात यह हैं कि सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत मांगी गई जानकारी न केवल समय सीमा में नहीं दी गई, बल्कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार पत्रकार मुकेश श्रीवास द्वारा विभाग में भ्रष्टाचार फर्जीवाड़े में स्वंय के द्वारा की गई शिकायतों, में जांच प्रतिवेदनों, पंचनामों और कार्रवाई से जुड़े अभिलेखों की जानकारी मांगी गई थी। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
सवाल यह है कि जब कानून सूचना देने का आदेश देता है और अपीलीय अधिकारी कलेक्टर मंडला ने अपीलीय की सुनवाई करते हुए निर्देश जारी कर दीये है, वावजूद इसके सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग कार्यालय किसके भरोसे कानून को चुनौती दे रहा है? जहाँ सूचना अधिकार अधिनियम की धज्जियाँ उड़ाते नजर आ रहे और आवेदक को जानकारी के नाम पर ठेंगा दिखा रहे हैं क्या विभाग में अधिकारी नहीं, बाबू चला रहे शासन?
मंडला के सहायक आयुक्त कार्यालय को लेकर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि यहां फाइलें नियमों से नहीं बल्कि बाबुओं की मर्जी से चलती हैं। यही कारण है कि अपीलीय आदेश के बाद भी जानकारी रोककर रखी गई है। इससे यह संदेश जा रहा है कि विभाग में “बाबूराज” संविधान और कानून से भी ऊपर बैठा हुआ है।
आखिर किसे बचाने की कोशिश?
RTI में जिन मामलों की जानकारी मांगी गई है, वे कथित रूप से नियुक्तियों, शिकायतों और जांचों से जुड़े गंभीर विषय हैं। ऐसे में सूचना रोकने से संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं विभाग किसी को बचाने या किसी फाइल में दफन सच्चाई को दबाने का प्रयास तो नहीं कर रहा।
यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है तो जांच रिपोर्ट, पंचनामा और कार्रवाई की प्रतियां देने में आखिर डर किस बात का?
सूचना नहीं, संदेह बढ़ा रहा विभाग
सूचना का अधिकार अधिनियम पारदर्शिता का कानून है, लेकिन मंडला का सहायक आयुक्त कार्यालय पारदर्शिता की जगह गोपनीयता की दीवार खड़ी करता दिखाई दे रहा है। जानकारी रोकने से अब यह मामला केवल एक RTI आवेदन का नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका है।
अब सूचना आयोग तय करेगा जवाबदेही?
यदि अपीलीय आदेश के बाद भी जानकारी नहीं दी जाती है तो मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचना तय माना जा रहा है। ऐसे में संबंधित लोक सूचना अधिकारी और जिम्मेदार अधिकारियों पर अधिनियम के तहत दंडात्मक कार्रवाई की तलवार भी लटक सकती है।
जनता पूछ रही है…
अपीलीय अधिकारी के आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ? सूचना देने से विभाग आखिर क्यों बच रहा है? क्या फाइलों में ऐसा कुछ है जिसे जनता से छिपाया जा रहा है?
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क्या सहायक आयुक्त कार्यालय में कानून से ज्यादा बाबुओं का प्रभाव है?
क्या जिला प्रशासन और राज्य सूचना आयोग इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे?
यदि पारदर्शिता है तो जानकारी दीजिए, यदि जानकारी नहीं दी जा रही तो संदेह होना स्वाभाविक है। आखिर सहायक आयुक्त कार्यालय मंडला किस सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है, यह अब बड़ा सवाल बन चुका है।
