बीएड डिग्री, अनुभव प्रमाण पत्र और नियुक्ति पर घमासान, शिक्षक महेश उइके का मामला हाईकोर्ट पहुंचा, विभागीय जांच पर उठे सवाल

Revanchal
10
7 Min Read

रेवांचल टाइम्स मंडला भड़िया की शासकीय माध्यमिक शाला में पदस्थ शिक्षक महेश उइके से जुड़ा मामला अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गया है। अतिथि शिक्षक से नियमित शिक्षक बने महेश उइके की बीएड डिग्री, अनुभव प्रमाण पत्र और सेवा अवधि को लेकर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता सियाराम पटैल ने आरोप लगाया है कि विभागीय अधिकारियों ने पूरे मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय शिक्षक को बचाने का प्रयास किया, जिसके बाद मामला मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय तक पहुंच गया।


मिली जानकारी के अनुसार महेश उइके वर्ष 2014-15 में शासकीय माध्यमिक शाला भड़िया में अतिथि शिक्षक वर्ग-2 के रूप में कार्यरत थे। इसी दौरान उन्होंने आदर्श कॉलेज पलारी जिला सिवनी से नियमित छात्र के रूप में बीएड की डिग्री प्राप्त की। शिकायतकर्ता का आरोप है कि शासन के स्पष्ट नियमों के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक ही समय में दो स्थानों पर नियमित उपस्थिति नहीं दे सकता। यदि कोई व्यक्ति विद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहा है, तो उसी अवधि में नियमित कॉलेज में अध्ययन करना नियम विरुद्ध माना जाता है।


सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित कॉलेज से नियमित बीएड की पढ़ाई करते हुए महेश उइके ने विद्यालय में शिक्षण कार्य कैसे किया। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया शासन की गाइडलाइन के विपरीत है और इसी आधार पर बाद में उन्हें शिक्षक पद पर नियुक्ति का लाभ मिला।


मामले में नया मोड़ तब आया जब विभागीय जांच के दौरान महेश उइके के कथनों और अनुभव प्रमाण पत्र में विरोधाभास सामने आया। जांच में महेश उइके द्वारा यह कथन दर्ज कराया गया कि उन्होंने वर्ष 2013 से 2018 तक कार्य किया। जबकि प्रस्तुत अनुभव प्रमाण पत्र वर्ष 2018 से 2019 तक का बताया गया। इसके अलावा वर्ष 2019 से 2021 तक उपस्थिति मानकर भुगतान किए जाने का भी आरोप सामने आया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि सेवा अवधि, अनुभव और भुगतान रिकॉर्ड में विसंगतियां हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।


ग्राम भड़िया निवासी सियाराम पटैल ने इस पूरे मामले की शिकायत सबसे पहले 10 जुलाई 2025 को सहायक आयुक्त मंडला को लिखित रूप में दी थी। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय में भी शिकायत दर्ज कर जांच की मांग की गई। शिकायत में यह स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि यदि महेश उइके नियमित छात्र के रूप में बीएड कर रहे थे, तो उसी समय अतिथि शिक्षक के रूप में कार्य करना संभव नहीं था। शिकायतकर्ता ने कॉलेज की उपस्थिति, विद्यालय के रिकॉर्ड और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच की मांग की थी।


शिकायतों के बाद विभाग ने 20 सितंबर 2025 को जांच टीम गठित की। लेकिन जांच पूरी होने के बाद विभाग ने शिकायत को “निराधार” और “द्वेषपूर्ण” बताते हुए मामला बंद कर दिया। विभागीय रिपोर्ट में किसी प्रकार की अनियमितता स्वीकार नहीं की गई। हालांकि शिकायतकर्ता ने इस जांच को पक्षपातपूर्ण बताते हुए सवाल खड़े कर दिए।


आरोप है कि जांच में महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति वर्ष 2013 से 2018 तक कार्यरत था, तो अनुभव प्रमाण पत्र केवल 2018-19 का कैसे जारी हुआ। वहीं 2019 से 2021 तक भुगतान और उपस्थिति का रिकॉर्ड भी संदेह के घेरे में है।आवेदक का कहना है कि पूरे मामले में दस्तावेजों की गहराई से जांच की जाए तो कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।


जब विभागीय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब शिकायतकर्ता ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की शरण ली। याचिका में निष्पक्ष जांच, सेवा रिकॉर्ड की जांच और नियम विरुद्ध नियुक्ति पर कार्रवाई की मांग की गई। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए 11 मई 2026 को आदेश जारी किया कि संबंधित विभाग 60 दिनों के भीतर अभ्यावेदन का निराकरण करे और नियमानुसार उचित कार्रवाई सुनिश्चित करे।


हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब शिक्षा विभाग की भूमिका पर निगाहें टिक गई हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो महेश उइके की नियुक्ति, अनुभव प्रमाण पत्र और बीएड डिग्री की वैधता पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही जांच में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय हो सकती है।


यह मामला केवल एक शिक्षक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे शिक्षा विभाग की पूरी निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति एक ही समय में नियमित छात्र और शिक्षक दोनों की भूमिका निभाता है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों पर भी चोट है।


आवेदक ने मांग की है कि मामले की उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि दस्तावेजों और उपस्थिति रिकॉर्ड की तकनीकी जांच हो, तो पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सकती हैआवेदक का आरोप है कि विभाग ने शिकायत को दबाने और मामले को समाप्त करने की कोशिश की, लेकिन हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब अधिकारियों के लिए जवाब देना आसान नहीं होगा।


फिलहाल पूरा मामला प्रशासनिक और कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा विभाग क्या कदम उठाता है और क्या वास्तव में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो पाती है या नहीं
वही इस मामले के संबंध में सहायक आयुक्त मंडला से जानकारी के संबंध में दो बार फोन से संपर्क किया गया पर सहायक आयुक्त मैडम के द्वारा कॉल रिसीव नही किया गया।

Share This Article
Translate »