अमानक मसूर खरीदी का बड़ा खेल उजागर, आखिर किसानों और शासन को कौन लगा रहा करोड़ों का चूना?

Revanchal
4 Min Read


दैनिक रेवांचल टाईम्स – जिला प्रशासन की जांच में डिंडोरी जिले के उपार्जन केंद्रों पर चल रहे कथित भ्रष्टाचार और लापरवाही की एक और परत खुल गई है। रबी विपणन वर्ष 2026-27 के तहत संचालित मसूर खरीदी में भारी अनियमितता सामने आने के बाद अब खरीदी केंद्र प्रभारी पर एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल एक प्रभारी पर कार्रवाई कर शासन और सहकारिता विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच पाएगा?


कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया के निर्देश पर हुई जांच में यह साफ हुआ कि बहुउद्देशीय कृषि साख सहकारी समिति मर्यादित बी-पेक्स डिंडोरी के अंतर्गत संचालित चना एवं मसूर उपार्जन केंद्र में बड़े पैमाने पर अमानक मसूर की खरीदी की गई। कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी आकाश तुरकर द्वारा की गई जांच में 725 क्विंटल मसूर निर्धारित गुणवत्ता मानकों के विपरीत पाया गया, जो सीधे तौर पर शासन की उपार्जन नीति और किसानों के भरोसे के साथ खिलवाड़ माना जा रहा है।


जांच में सामने आया कि किसान द्वारा लाई गई मसूर को बिना छन्ना-पंखा, बिना साफ-सफाई और बिना गुणवत्ता परीक्षण के सीधे शासकीय बारदानों में भरकर खरीदा गया। इतना ही नहीं, गोदामों में रखी सैकड़ों बोरियों में तेवड़ा, कचरा और सिकुड़े दाने पाए गए। सवाल यह उठता है कि जब उपार्जन केंद्रों पर गुणवत्ता जांच के लिए कर्मचारी, समिति प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारी तैनात रहते हैं, तो आखिर इतनी बड़ी मात्रा में अमानक मसूर खरीदी कैसे हो गई?


सूत्रों की मानें तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि एक संगठित खेल की ओर इशारा करता है, जहां नियमों को ताक पर रखकर अमानक उपज को मानक बताकर खरीदी की जाती है और बाद में उसे “बारिश में नमी बढ़ने” जैसे बहानों से छुपाने का प्रयास किया जाता है। यदि जांच नहीं होती तो यही मसूर शासन के रिकॉर्ड में “एफएक्यू गुणवत्ता” के नाम पर पास हो जाती और करोड़ों रुपए की राशि का भुगतान भी हो जाता।


खरीदी केंद्र प्रभारी रघुवर सिंह गौतम ने अपने जवाब में कई आरोपों को स्वीकार भी किया है। इसके बाद सहायक आयुक्त सहकारिता को एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन अब सवाल पूरे सहकारिता विभाग और उपार्जन व्यवस्था पर खड़े हो रहे हैं। क्या इतने बड़े स्तर पर हुई खरीदी में केवल एक व्यक्ति जिम्मेदार है? क्या गोदाम प्रभारी, गुणवत्ता निरीक्षक और उच्च अधिकारी पूरी तरह अनजान थे? या फिर सबकी मिलीभगत से यह खेल चल रहा था?


प्रदेश सरकार किसानों के हित में पारदर्शी उपार्जन व्यवस्था का दावा करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात इसके उलट नजर आ रहे हैं। किसान जहां अपनी उपज बेचने के लिए नियमों और गुणवत्ता जांच के नाम पर परेशान होते हैं, वहीं दूसरी ओर उपार्जन केंद्रों में कथित भ्रष्टाचार का यह खेल सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

👁️ 11 views Views
Share This Article
Translate »