गाली-गलौज, मारपीट और जान से मारने की धमकी के मामले में तीन दोषियों को न्यायालय उठने तक की सजा

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, जिले की नैनपुर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी न्यायालय, नैनपुर ने गाली-गलौज, मारपीट एवं जान से मारने की धमकी देने के मामले में अभियुक्त निरोत्तम नाग, उषा नाग एवं वचनलाल नाग को दोषी ठहराते हुए उन्हें न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई है।


प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस थाना नैनपुर, जिला मंडला के अपराध क्रमांक 106/2023 में भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 294, 323, 323/34 एवं 506 (भाग-2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार, दिनांक 24 फरवरी 2023 को दोपहर लगभग 2 बजे, वार्ड क्रमांक 14 स्थित छोटी खैरमाईटोला, नैनपुर में जग्गू सिसोदिया के घर के सामने यह घटना घटित हुई थी।


अभियोजन के अनुसार, प्रार्थी गोपाल नाग पंचनामा की कार्यवाही के दौरान हस्ताक्षर करने के लिए जग्गू सिसोदिया के घर पहुंचे थे। पंचनामा की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद जब वे वहां बैठे हुए थे, तभी अभियुक्त निरोत्तम नाग लोहे की रॉड लेकर पहुंचे और प्रार्थी के साथ अश्लील गाली-गलौज करते हुए उन पर हमला कर दिया। आरोप है कि निरोत्तम नाग ने लोहे की रॉड से प्रार्थी के बाएं हाथ की कोहनी पर प्रहार किया तथा उनके साथ मारपीट की।


इसी दौरान सह-अभियुक्त उषा नाग ने हाथ-मुक्कों से मारपीट की, जबकि वचनलाल नाग ने लकड़ी की कुबड़ी से प्रार्थी के गले में चोट पहुंचाई। घटना के बाद तीनों आरोपियों ने प्रार्थी को दोबारा उनके खिलाफ बोलने पर जान से खत्म करने की धमकी भी दी।


मामले में थाना नैनपुर में पदस्थ सहायक उपनिरीक्षक यशवंत राहंगडाले को दिनांक 24 फरवरी 2023 को अस्पताल से प्राप्त तहरीर के आधार पर जांच सौंपी गई। जांच के दौरान आहत गोपाल नाग एवं अन्य गवाहों के कथन दर्ज किए गए तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया।
विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों के परीक्षण के पश्चात न्यायालय ने पाया कि अभियोजन आरोप सिद्ध करने में सफल रहा। इसके आधार पर न्यायालय ने अभियुक्त निरोत्तम नाग, उषा नाग एवं वचनलाल नाग को दोषसिद्ध करते हुए न्यायालय उठने तक की सजा से दंडित किया।
गौरतलब है कि “न्यायालय उठने तक की सजा” का अर्थ यह होता है कि दोषी व्यक्तियों को उस दिन न्यायालय की कार्यवाही समाप्त होने तक न्यायालय में उपस्थित रहना होता है। यह अपेक्षाकृत कम अवधि की कारावास की श्रेणी में माना जाता है, जो प्रायः कम गंभीर प्रकृति के मामलों में न्यायालय के विवेकाधिकार के आधार पर दी जाती है।

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