जबलपुर पुलिस की समीक्षा बैठक : शब्दों में कानून, ज़मीन पर सवाल

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Jabalpur police review meeting: Law in words, questions on ground

जबलपुर पुलिस की समीक्षा बैठक : शब्दों में कानून, ज़मीन पर सवाल

जबलपुर के पुलिस अधीक्षक सम्पत उपाध्याय ने अपराध समीक्षा बैठक ली। लंबी सूची थी…गुमशुदा बच्चों की तलाश, फरार आरोपियों पर इनाम, महिला अपराधों पर संवेदनशीलता, त्योहारों से पहले बदमाशों पर कार्रवाई और जनता की शिकायतों का त्वरित निराकरण।
बोलने में सब ठीक है, सुनने में और भी अच्छा। लेकिन सवाल वहीं है…क्या इन आदेशों के बाद आम नागरिक की चिंता घटेगी या सिर्फ फाइलों का बोझ बढ़ेगा?
बैठक में राजपत्रित अधिकारी, थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी सब मौजूद थे। आंकड़े पढ़े गए, तुलनात्मक समीक्षा हुई। अपराध की श्रेणियों पर चर्चा हुई…हत्या, लूट, झपटमारी, नकबजनी, महिला अपराध। निर्देश दिये गये कि फरार आरोपियों को पकड़ने के लिए टीम बनाओ। गुम बच्चों को हर हाल में तलाशो। सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें निपटाओ।


लेकिन यह सब सुनकर एक नागरिक यही सोचता है…”क्या मुझे अगली बार थाने में भटकना नहीं पड़ेगा?”
क्योंकि वास्तविकता ये है कि शिकायतें महीनों तक लंबित रहती हैं। गुमशुदा बच्चों के पोस्टर तो हर गली में चिपके मिल जाते हैं, लेकिन उनके लौटने की कहानियाँ कितनी हैं?

Jabalpur police review meeting: Law in words, questions on ground
Jabalpur police review meeting: Law in words, questions on ground


महिला अपराधों पर “संवेदनशीलता” बरतने की हिदायत दी गई। शब्द अच्छे लगते हैं, मगर जब पीड़िता रात को रिपोर्ट दर्ज कराने जाती है तो वही संवेदनशीलता फाइल खोलने से पहले पूछताछ की दीवार में टकरा जाती है।
त्योहारों के पहले गुण्डों और चाकूबाजों पर “कड़ी कार्रवाई” करने का ऐलान हुआ। लेकिन क्या अपराधी पुलिस की भाषा सुनकर सुधरते हैं, या फिर सिर्फ प्रेस नोट की स्याही सूखते ही फिर से वही करते हैं?


बैठक का निष्कर्ष यही है कि पुलिस खुद पर पुलिसिंग कर रही है। फाइलों पर कार्रवाई, बैठकों पर समीक्षा, और नागरिक पर भरोसे का बोझ।
पुलिस अधीक्षक ने कहा…”हमारा उद्देश्य शांति और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना है।”
लोग यही चाहते हैं। लेकिन उनकी आँखों में अब सवाल भी है…”बैठकों से ज़्यादा असर सड़कों पर दिखेगा या नहीं?”
क्योंकि समीक्षा की भाषा में विश्वास है, और ज़मीन पर डर।
रिपोर्ट आरती लोधी

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