अब नोटिस और दबाव की राजनीति पर उठे सवाल
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला
अश्वनी झारिया एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में हैं। डिंडौरी जिले में करोड़ों रुपए के कथित भ्रष्टाचार, योजनाओं में गड़बड़ी और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में दर्ज प्रकरणों के बाद भी उन्हें मंडला जिले में किसान कल्याण एवं कृषि विभाग के प्रभारी उप संचालक का जिम्मा सौंपा जाना अब शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
वही मंडला जिले में पदस्थापना के बाद भी विभागीय योजनाओं में अनियमितताओं, किसानों की शिकायतों और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की लगातार खबरें सामने आती रहीं, जिन्हें दैनिक रेवांचल टाइम्स ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों पर जवाब देने के बजाय अब अधिकारी द्वारा समाचार पत्र और पत्रकारों पर कानूनी नोटिसों का दबाव बनाकर आवाज दबाने की कोशिश किए जाने के आरोप लग रहे हैं।
“भ्रष्टाचार उजागर होते ही नोटिस का हथियार”
वही सूत्रों के अनुसार यह सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार कर भ्रस्ट अधिकारियों के द्वारा नया तरीका नहीं है। जहाँ की जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण व्यरो में पेंडिंग पड़ी है और प्रकाशित खबरों में भ्रष्टाचार छुपाने और पत्रकार पर दवाब बनाने के लिए थमाया नोटिश पर जल्द ही ये पूरा मामला उच्च न्यायालय जबलपुर की शरण मे जा सकता है मय साक्ष्यों के भ्रस्ट उपसंचालक अश्वनी झरिया के द्वारा डिंडौरी जिले में भी अपनी पदस्थापना के दौरान पत्रकारों और शिकायतकर्ताओं ने जब योजनाओं में गड़बड़ियों को उजागर किया था, तब कथित रूप से पत्रकारों और शिकायतकर्ताओं को मानहानि के नोटिस भेजकर डराने और दबाब बनाए जाने का प्रयास किया गया था।
बताया जाता है कि पत्रकार राजेश विश्वकर्मा और रवि मिश्रा सहित शिकायतकर्ता रुपभान पाराशर को भी पहले प्रलोभन दिया गया जब इनके द्वारा मना करने पर लाखों रुपए के नोटिस देकर दबाव बनाने की कोशिश की गई थी। लेकिन बाद में मामला तब और गंभीर हो गया और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, जबलपुर ने भ्रष्टाचार के मामले में एफआईआर दर्ज कर ली।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतने गंभीर आरोपों और जांचों के बावजूद अधिकारी पर कार्रवाई हुई थी, तो आखिर किसके संरक्षण में उन्हें दूसरे जिले में फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी गई?
“पहले प्रलोभन, फिर दबाव और अब नोटिस?”
जिले में चर्चा है कि अधिकारी की कार्यशैली लंबे समय से “साम-दाम-दंड-भेद” की नीति पर आधारित रही है। पहले समझौते और प्रलोभन का प्रयास, और जब बात न बने तो नोटिस और दबाव की रणनीति।
अब मंडला में भी वही तस्वीर सामने आ रही है।
जब इनके कारनामों की पोल लगातार मंडला जिले से प्रकाशित समाचार पत्र दैनिक रेवांचल टाईम्स समाचार में इनके कारनामों की मुहिम छेड़ी तो जबलपुर के अधिवक्ता के द्वारा रेवांचल टाइम्स को भेजे गए नोटिस को लेकर पत्रकार जगत में नाराजगी देखी जा रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी पद पर बैठे अधिकारी आलोचना और सवालों से इतने असहज हो चुके हैं कि अब मीडिया की आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है? कहाँ जिम्मेदार
“सीएम हेल्पलाइन शिकायतकर्ता किसान को धमकी देने का आरोप”
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मामले से जुड़ा एक और गंभीर आरोप सामने आया है। किसान भुवन लाल सिंगौर द्वारा सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराने के बाद कथित रूप से उस पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया गया।
आरोप है कि किसान को कार्यालय बुलाकर हरिजन एक्ट में फंसाने तक की धमकी दी गई। घटना के बाद भयभीत किसान कलेक्टर कार्यालय पहुंचा, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। इससे प्रशासन की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
कलेक्टर से लेकर जनप्रतिनिधियों तक सब मौन?
मंडला जिले में लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब जिला प्रशासन भी घेरे में आ गया है। आखिर क्यों एक ऐसे अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हो रही, जिनके खिलाफ पहले से भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप चर्चा में रहे हैं?
जिले के किसानों का आरोप है कि योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचने के बजाय कागजों और विभागीय खेल में उलझता जा रहा है। किसानों के हितों की रक्षा करने वाला विभाग अब खुद सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है।
इतना ही नहीं, जिले के जनप्रतिनिधियों, सांसदों और जिम्मेदार नेताओं तक शिकायतें पहुंचने के बावजूद कार्रवाई न होना कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कौन-सी ताकत है जो अश्वनी झारिया को “अंगद के पैर” की तरह कुर्सी से हिलने नहीं दे रही?
“मीडिया को डराकर सच नहीं दबेगा”
वही रेवांचल टाईम्स के पत्रकार का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार नहीं हुआ तो फिर सवालों से डर क्यों? नोटिस भेजकर खबरों को दबाने की कोशिश लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
हमारे पास किसान कल्याण एंव कृषि विभाग में हुए सरकारी योजनाओं में हुए भ्रष्टाचार घोटाला ग़बन और किसानों के साथ धोखाधड़ी फर्जीवाड़े फर्जी बिल और अपने ड्राइवर से दूकानों से अबैध वसूली तक के दस्तावेज मय साक्ष्य है और आवश्कता पड़ने पर माननीय न्यायालय के समक्ष पेश किए जा सकते है या फिर जनहित याचिका भी उच्च न्यायालय जबलपुर के समक्ष प्रस्तुत करने की तैयारी चल रही है क्योंकि लगातार शिक़वा शिकायत पर आज तक इन पर अनेकों जांच बेठी पर कार्यवाही के नाम पर केवल छलावा हो रहा है और जिले के किसान दिन व दिन इनसे आहत नजर आ रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इन गंभीर आरोपों पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या किसानों की योजनाओं में कथित भ्रष्टाचार, शिकायतकर्ताओं को धमकाने और मीडिया पर दबाव बनाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर पूरा मामला फाइलों में दबाकर छोड़ दिया जाएगा? या फिर न्यायालय ही न्याय करेगा।
मुकेश श्रीवास की रिपोर्ट
