चाय की दुकान पर बिक रहा था न्याय! रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया एएसआई

Revanchal
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चाय की दुकान पर बैठा था एएसआई… और रिश्वत की चुस्कियाँ ले रहा था
सिवनी में एक एएसआई पकड़ा गया।
बीस हजार रुपये रिश्वत लेते हुए।
जगह क्या थी?
कोई आलीशान दफ्तर नहीं… कोई बंद कमरा नहीं…
एक चाय की दुकान।
अब ज़रा ठहरिए… और सोचिए।
इस देश में चाय की दुकानें कभी बहस की जगह हुआ करती थीं। लोग देश-दुनिया पर चर्चा करते थे। लेकिन अब वही चाय की दुकानें सरकारी सौदों की अनौपचारिक शाखा बनती जा रही हैं। जहां कानून की फाइलें नहीं खुलतीं… रेट खुलते हैं।
मामला सिवनी जिले के कोतवाली थाना में पदस्थ कार्यवाहक एएसआई दिनेश रघुवंशी का है। लोकायुक्त जबलपुर की टीम ने उसे बीस हजार रुपये लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। शिकायतकर्ता नंदकिशोर चौरसिया थे। उनका आरोप था कि बेटे को नौकरी दिलाने और सरकारी विभाग में गाड़ी लगवाने के नाम पर ठगी हुई। उन्होंने एफआईआर दर्ज कराई। लेकिन यहां कहानी खत्म नहीं होती… यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच अधिकारी साहब ने कहा — सही रिपोर्ट चाहिए? फर्जी सिग्नेचर की जांच करवानी है? तो तीस हजार रुपये लगेंगे।
यानि…
जिस पुलिस से न्याय की उम्मीद थी, वही न्याय की फाइल पर प्राइस टैग चिपका रही थी।
मोलभाव हुआ।
रिश्वत तीस हजार से घटकर बीस हजार पर आ गई।
सिस्टम में ईमानदारी नहीं बची, लेकिन मोलभाव की गुंजाइश अब भी बची हुई है।
लोकायुक्त ने जाल बिछाया और 13 मई को चाय की दुकान पर एएसआई को पकड़ लिया। अब भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई हो रही है। कार्रवाई… यह शब्द हमारे यहां बड़ा दिलचस्प है। कार्रवाई तब होती है जब कैमरा पहुंच जाता है। वरना आम आदमी महीनों थाने और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
उसी सिवनी जिले में लोकायुक्त ने एक और रिश्वतखोर बाबू को पकड़ा। विकासखंड अधिकारी कार्यालय धनोरा में पदस्थ सहायक ग्रेड-3 अरुण कुमार कमरे। आरोप है कि उसने एक भृत्य देवेंद्र सिरसाम से उसके 14 महीने के जीवन निर्वाह भत्ते की फाइल आगे बढ़ाने के लिए 32 हजार रुपये मांगे।
सोचिए…
एक कर्मचारी, जो पहले से निलंबन झेल चुका है… जिसकी आर्थिक हालत पहले ही डगमगा चुकी होगी… उससे भी सिस्टम रिश्वत मांग रहा था।
सरकारी दफ्तरों में फाइलें अब कागज से नहीं चलतीं… नोटों से चलती हैं।
शिकायत हुई। सत्यापन हुआ। रकम 32 हजार से घटकर 25 हजार पर पहुंची। और आखिरकार लोकायुक्त ने आरोपी बाबू को 10 हजार रुपये लेते हुए पकड़ लिया।
यह खबर सिर्फ दो रिश्वतखोर कर्मचारियों के पकड़े जाने की नहीं है।
यह खबर उस व्यवस्था की है जहां भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं रहा… प्रक्रिया बन चुका है।
थानों में न्याय बिक रहा है।
दफ्तरों में वेतन और भत्तों की फाइलें बिक रही हैं।
और आम आदमी?
वह हर टेबल पर खुद को थोड़ा-थोड़ा गिरवी रखता जा रहा है।
टीवी डिबेट्स में भ्रष्टाचार पर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। भाषणों में जीरो टॉलरेंस सुनाई देता है। लेकिन ज़मीन पर सच्चाई यह है कि रिश्वत अब डरकर नहीं ली जाती… बेखौफ ली जाती है। कभी चाय की दुकान पर… कभी सरकारी दफ्तर की टेबल के नीचे।
सवाल सिर्फ इतना नहीं कि ये दो लोग पकड़े गए।
सवाल यह है कि जो नहीं पकड़े गए… वे कितनी चाय की दुकानों पर आज भी सिस्टम बेच रहे हैं?
मुहम्मद अनवार बाबू

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