धन की चोरी हो सकती है श्रद्धा की नहीं

Revanchal
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दैनिक रेवांचल टाईम्स – श्री राम मंदिर अयोध्या में चढ़ावा की चोरी का समाचार सामने आते ही पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है समाचार माध्यमों में बहस शुरू हो गई है और अनेक लोगों द्वारा आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं बिना तथ्य जाने ही मंदिर उसकी व्यवस्था तथा करोड़ो श्रद्धालुओं की आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाना प्रारंभ कर दिए हैं भारतीय संस्कृति में आस्था किसी तिजोरी दान पात्र या चढ़ावे में नहीं रहती वह श्रद्धालु के हृदय में निवास करती है प्रभु श्री राम करोड़ों लोगों के लिए केवल पूजनीय देवता नहीं है बल्कि मर्यादा न्याय त्याग और आदर्श जीवन के प्रतीक है यदि को कुछ व्यक्तियों ने अपने दायित्व का दुरुपयोग किया है तो उसका दोष उन व्यक्तियों का है भगवान का नहीं धन की चोरी हो सकती है श्रद्धा की नहीं
भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं श्रद्धावान लभते ज्ञानम अर्थात श्रद्धा रखने वाला ही सत्य और ज्ञान को प्राप्त करता है सनातन परंपरा में श्रद्धा का आधार व्यक्ति नहीं परमात्मा है लेकिन ईश्वर और धर्म के प्रति विश्वास स्थाई रहता है दुख चोरी से तब होता है जब कुछ लोग इस घटना को अवसर बनाकर मंदिरों और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का उपवास करने लगते हैं जिन लोगों का मंदिरों या आस्था से कभी कोई संबंध नहीं रहा वे अचानक सबसे बड़े शुभचिंतक बनकर धर्म पर प्रश्न उठाने लगते हैं यदि किसी सेवक कर्मचारी या अधिकारी ने चढ़ावे में गलती की है तो उसे कठोरता दंड मिलना चाहिए इस घटना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है यह हमें धार्मिक संस्थाओं की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी उत्तरदाई और आधुनिक बनाने की प्रेरणा देता है करोड़ों श्रद्धालु अपनी मेहनत की कमाई का अंश मंदिरों में दान करते हैं उनका विश्वास सर्वोच्च धरोहर है भारतीय संस्कृति का मूल सिद्धांत है धर्मो रक्षति रक्षिता अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है धर्म की रक्षा केवल पूजा पाठ से नहीं होती बल्कि ईमानदारी पारदर्शिता उत्तरदायित्व और सुशासन से होती है जब धार्मिक संस्थाएं स्वयं आदर्श प्रशासन का उदाहरण बनेगी तब श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा आज आवश्यकता है इस बात की हम भावनात्मक उत्तेजना में बहकर निष्कर्ष ना निकाले अपराधी और संस्था के बीच अंतर समझ दोष व्यक्ति का हो सकता है सिद्धांत का नहीं गलती प्रबंधन की हो सकती है भगवान की नहीं मंदिरों का सम्मान उनकी दीवारों से नहीं वहां आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा से होता है सनातन परंपरा आत्म मंथन से कभी नहीं डरती जहां कहीं दिखाई देती है वहां सुधार का मार्ग अपनाती है इसलिए इस घटना को छिपाने या नकारने के बजाय इस व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने के अवसर के रूप में देखना चाहिए

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