दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला।
मध्यप्रदेश सरकार के भाषणों में किसान आज आत्मनिर्भर, समृद्ध और खुशहाल है। मंचों से लेकर मीडिया तक यही बताया जा रहा है कि प्रदेश का गेहूं अब विदेशों तक अपनी खुशबू फैला रहा है और किसान मालामाल हो चुका है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
उपार्जन केंद्रों में सन्नाटा पसरा हुआ है, तौल कांटे खाली पड़े हैं और किसान अपने ही घरों में खुले आसमान के नीचे गेहूं ढकने के लिए तिरपाल खोज रहा है।
वजह सिर्फ एक — “स्लॉट बुक नहीं हो रहा है।”
सरकार कहती है कि “किसानों का एक-एक दाना खरीदा जाएगा”, लेकिन सिस्टम ऐसा बना दिया गया है कि किसान पहले मोबाइल, नेटवर्क और वेबसाइट से लड़ाई लड़े, बाद में सरकार द्वारा फिक्स किया जाए सिस्टम की मार से तब जाकर अपनी मेहनत की फसल बेच पाए। गावों में और उपार्जन केंद्रों में जाकर के किसानों का हाल पता करने से ऐसा लगने लगा है कि अब किसान को खेती से ज्यादा ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग का प्रशिक्षण चाहिए।
प्रदेश के मुखिया हेलीकॉप्टर से उपार्जन केंद्र पहुंचकर किसानों से पूछ रहे हैं कि “कोई परेशानी तो नहीं?”
इधर किसान सोच रहा है कि “साहब, परेशानी बताने के लिए पहले स्लॉट तो मिल जाए!”
पहले कहा गया कि स्लॉट नहीं खुल रहे हैं, फिर वेबसाइट का समय थोड़ा बढ़ाकर किसानों को ऐसा एहसास कराया गया जैसे सरकार ने बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो। अब दोष भी किसान का — “आप समय पर जागे नहीं, इसलिए स्लॉट नहीं मिला।”
वाह रे व्यवस्था!
एक तरफ किसान हितैषी सरकार होने का दावा, दूसरी तरफ फाइलों में पहले से तय टारगेट कि कितनी उपज खरीदनी है। यानी किसान चाहे जितना गेहूं पैदा कर ले, खरीदी उतनी ही होगी जितनी दफ्तरों में आंकड़ों की कलम तय करेगी।
बारिश की बूंदें खेत और घर में रखे गेहूं को भिगो रही हैं, लेकिन सरकारी सिस्टम अब भी “लोडिंग…” में अटका हुआ है।
आज किसान की हालत ऐसी हो गई है कि वह फसल उगाने से ज्यादा पोर्टल खुलने की दुआ कर रहा है।
सरकार भाषणों में किसानों को “अन्नदाता” कहती है, लेकिन व्यवहार में वही अन्नदाता स्लॉट, सर्वर और सिस्टम का सबसे बड़ा भिखारी बना दिया गया है।
अब सवाल यही है कि क्या सरकार खेत में पसीना बहाने वाले किसान की सुध लेगी, या फिर ऐसे ही पोर्टल और प्रचार के सहारे किसानों को सांत्वना देती रहेगी?
