रेवांचल टाइम्स मंडला प्रदेश से लेकर जिले और गांव-गांव तक इन दिनों भीषण गर्मी और नौतपा की तपिश ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। लगातार बढ़ रहे तापमान ने आम जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। सुबह से ही तेज धूप और गर्म हवाओं का असर दिखाई देने लगता है, जबकि दोपहर होते-होते सड़कें सुनसान नजर आने लगती हैं। लोग जरूरी काम होने पर ही घरों से बाहर निकल रहे हैं। कई जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है, जिससे हालात दिन-ब-दिन गंभीर होते जा रहे हैं।
नौतपा के दौरान सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं, जिसके कारण गर्मी का असर कई गुना बढ़ जाता है। इस बार नौतपा की शुरुआत के साथ ही गर्मी ने अपने तेवर और अधिक कड़े कर लिए हैं। शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग गर्मी से बेहाल हैं। सबसे ज्यादा परेशानी मजदूर वर्ग, किसान, रिक्शा चालक और खुले आसमान के नीचे काम करने वाले लोगों को हो रही है। तेज धूप और लू के कारण कई लोग बीमार पड़ रहे हैं।
अस्पतालों में उल्टी, दस्त, डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी है।गांवों में स्थिति और भी चिंताजनक बनी हुई है। कई क्षेत्रों में जल स्तर नीचे चला गया है, जिसके कारण हैंडपंप और कुएं सूखने लगे हैं। लोगों को पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। तालाब और छोटे जल स्रोत भी सूखते नजर आ रहे हैं। पशु-पक्षी भी पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं। दोपहर के समय पेड़ों की छांव में मवेशियों का जमावड़ा देखा जा रहा है। गर्मी का असर फसलों पर भी पड़ रहा है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ रही गर्मी और मौसम में आ रहे बदलाव का मुख्य कारण पर्यावरण असंतुलन है। विकास के नाम पर तेजी से पेड़ों की कटाई, जंगलों का विनाश और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन आने वाले समय के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। पहाड़ों को काटकर निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, नदियों का स्वरूप बदल रहा है और हरियाली लगातार कम होती जा रही है। इसका सीधा असर मौसम पर दिखाई दे रहा है।
पर्यावरणविदों के अनुसार पहले गांवों और शहरों में बड़ी संख्या में पेड़-पौधे और खुले मैदान हुआ करते थे, जिससे वातावरण संतुलित रहता था। लेकिन अब कंक्रीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं। हरियाली कम होने के कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है।
पेड़ वातावरण को ठंडा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन अंधाधुंध कटाई से यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है। यही कारण है कि हर साल गर्मी नए रिकॉर्ड बना रही है।शहरों में बिजली की मांग भी बढ़ गई है। दिन-रात कूलर, पंखे और एसी चलने से बिजली खपत में भारी इजाफा हुआ है। कई जगहों पर बिजली कटौती की समस्या भी सामने आने लगी है। बिजली बंद होते ही लोगों का घरों में रहना मुश्किल हो जाता है।
गर्मी के कारण बाजारों में भी सन्नाटा देखने को मिल रहा है। दोपहर के समय दुकानें बंद हो रही हैं और लोग शाम होने के बाद ही खरीदारी के लिए निकल रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को दोपहर के समय घरों से बाहर नहीं निकलने की सलाह दी है। डॉक्टरों का कहना है कि तेज धूप में निकलने से हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों और बुजुर्गों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। लोगों को अधिक से अधिक पानी पीने, हल्का भोजन करने और सिर ढंककर बाहर निकलने की सलाह दी जा रही है।
दूसरी ओर मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में तापमान और बढ़ने की संभावना जताई है। यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की किल्लत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। प्रशासन द्वारा कई जगहों पर पानी के टैंकर भेजे जा रहे हैं, लेकिन बढ़ती गर्मी के सामने यह व्यवस्था भी नाकाफी साबित हो रही है।पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूक लोग अब चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
उनका कहना है कि यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। केवल सरकारी योजनाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को पर्यावरण बचाने के लिए आगे आना होगा। वृक्षारोपण को जन आंदोलन बनाना होगा और जल संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना होगा।विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि गांवों में पुराने तालाबों और जल स्रोतों का संरक्षण किया जाए तो पानी की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। वर्षा जल संग्रहण को बढ़ावा देने की जरूरत है।
साथ ही जंगलों की कटाई पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही विकास संभव है।भीषण गर्मी और नौतपा की यह स्थिति केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि प्रकृति का चेतावनी संकेत भी माना जा रहा है। यदि इंसान अब भी नहीं चेता तो आने वाले वर्षों में तापमान और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और प्रकृति को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संतुलित वातावरण मिल सके।
