“आबकारी पर शराब माफिया भारी!” सहायक आयुक्त को खुद मारना पड़ रहा छापा – फिर भी नहीं रुक रही ‘एमआरपी’ की लूट

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“आबकारी पर शराब माफिया भारी!” सहायक आयुक्त को खुद मारना पड़ रहा छापा – फिर भी नहीं रुक रही ‘एमआरपी’ की लूट

दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर

प्रदेश के कई जिलों में शराब माफिया का आतंक इस हद तक बढ़ चुका है कि अब आबकारी विभाग के सहायक आयुक्तों को स्वयं दुकानों पर छापेमारी करनी पड़ रही है, लेकिन इसके बावजूद हालात काबू में नहीं आ रहे। खुलेआम एमआरपी से ज्यादा दर पर शराब बेचना अब एक आम चलन बन चुका है। सवाल यह है कि – यह अवैध मुनाफाखोरी आखिर किसकी जेब में जा रही है?

मौके पर अफसर, फिर भी जारी है ‘दर से ऊपर’ वसूली

हाल ही में एक प्रमुख शराब ठेके पर जब सहायक आयुक्त ने खुद अचानक छापा मारा, तो वहां एमआरपी से 20 से 60 रुपये प्रति बोतल ज्यादा वसूली की पुष्टि हुई। दुकान में बिल देने से भी इनकार किया गया और कार्ड से भुगतान पर “कैश में लो” कहकर टाल दिया गया।

लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि ऐसे कई ठेकों पर पहले भी शिकायते दर्ज हो चुकी थीं, बावजूद इसके लाइसेंस रिन्यू हो गए और ठेके चालू हैं।

The liquor mafia is overpowering the excise!” The assistant commissioner had to kill himself
The liquor mafia is overpowering the excise!” The assistant commissioner had to kill himself

नियमों की उड़ रही धज्जियां – माफिया मस्त, विभाग पस्त

आबकारी नीति स्पष्ट रूप से कहती है कि शराब बिक्री एमआरपी पर होगी, ग्राहकों को बिल देना अनिवार्य होगा, और किसी भी ग्राहक से बदसलूकी करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है:

ग्राहक से ₹140 की बोतल के ₹180 लिए जा रहे हैं

कोई बिल नहीं, कोई रसीद नहीं

सवाल करने पर “जो करना है कर लो” जैसी धमकियाँ

प्रशासन के संरक्षण की भी आशंका

स्थानीय लोग खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि शराब ठेकेदारों को स्थानीय प्रशासन और आबकारी विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। यही वजह है कि शिकायतों के बावजूद कोई बड़ी कार्रवाई नहीं होती, और सहायक आयुक्त को भी अकेले ही छापे मारने पड़ रहे हैं।

क्या कहता है आबकारी विभाग?

जब इस मुद्दे पर वरिष्ठ आबकारी अधिकारी से सवाल किया गया तो जवाब मिला:
“हम नियमित निरीक्षण कर रहे हैं, और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी। जनता से अपील है कि शिकायत दर्ज करें।”

लेकिन सवाल ये है – जब शिकायतों के बाद भी कुछ नहीं बदला तो क्या ये बयान भी खानापूर्ति ही है?

प्रदेश में शराब सिर्फ नशा नहीं, अब मुनाफे की गंदी राजनीति का केंद्र बन चुकी है। जब विभाग खुद छापे मारने पर मजबूर हो, तब यह स्थिति बता देती है कि माफिया अब नीति से नहीं, ताक़त से खेल रहे हैं।

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