तामिया के उमरवहा गांव में मिसाल; 45 परिवारों ने 65 हजार चंदा जुटाकर जेसीबी से संवारा अपना रास्ता
रेवांचल टाइम्स छिंदवाड़ा
तामिया (सिधौली)
आजादी के अमृत काल में जब सरकारें ‘हर गांव-हर डगर’ सड़क का दावा करती हैं, तब छिंदवाड़ा जिले के तामिया जनपद से आई यह तस्वीर प्रशासन को आईना दिखाने वाली है। ग्राम पंचायत सिधौली के उमरवहा (हरदौल ढाना) के ग्रामीणों ने पंचायत की अनदेखी से तंग आकर वह कर दिखाया, जो काम शासन को वर्षों पहले कर लेना चाहिए था। वर्षों के इंतजार और अधिकारियों की चौखट पर माथा टेकने के बाद, जब नतीजा सिफर रहा, तो ग्रामीणों ने खुद चंदा कर सड़क का निर्माण शुरू कर दिया है।
आश्वासनों की भेंट चढ़ता रहा विकास
हरदौल ढाना में करीब 45 मकानों की आबादी है। मुख्य सड़क से गांव को जोड़ने वाली 2 किलोमीटर की यह राह अब तक सरकारी फाइलों में ही दौड़ रही थी। ग्रामीणों का आरोप है कि अनेक बार ग्राम पंचायत, सरपंच और सचिव को लिखित आवेदन दिए गए।
ग्राम सभा में भी सड़क की मांग प्रमुखता से रखी गई।
हर बार पंचायत प्रशासन ने केवल आश्वासन का झुनझुना पकड़ा दिया।
गर्भवती और बीमारों की जान पर बन आती थी आफत
ग्रामीणों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि कच्ची और ऊबड़-खाबड़ राह की वजह से बारिश के चार महीने यह गांव टापू बन जाता था। सबसे बुरा हाल तब होता था जब कोई बीमार हो या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो। कीचड़ के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती थी, जिससे मरीज को खटिया पर लादकर मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ता था।
65 हजार की ‘जन-शक्ति’ से बदली तस्वीर
पंचायत की लापरवाही देख ग्रामीणों ने अब आत्मनिर्भर बनने का फैसला किया। गांव के प्रत्येक घर ने अपनी सामर्थ्य अनुसार सहयोग दिया और देखते ही देखते 65 हजार रुपए का चंदा इकट्ठा हो गया। इसी राशि से जेसीबी मशीन बुलाई गई और झाड़-झंखाड़ साफ कर कच्ची सड़क का निर्माण युद्ध स्तर पर शुरू किया गया।
हताश ग्रामीण, हरदौल ढाना, का कहना है कि
हम कब तक प्रशासन के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते? हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे और बीमारों की जान खतरे में रहती थी। इसलिए हमने खुद ही सड़क बनाने का फैसला लिया।
बड़े सवाल, आखिर जिम्मेदार मौन क्यों?
ग्रामीणों के इस कदम ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,
क्या पंचायत के पास इस सड़क के लिए बजट का अभाव था या मंशा की कमी?
ग्रामीणों की बार-बार की शिकायतों को उच्च अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंचाया गया?
जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी अब इस ‘श्रमदान’ और ‘निजी खर्च’ पर क्या रुख अपनाते हैं?
ग्रामीणों ने सड़क बनाकर अपनी राह तो आसान कर ली है, लेकिन अब देखना यह है कि क्या इस खबर के बाद प्रशासन की नींद खुलती है और इस कच्ची सड़क को ‘पक्की डामर सड़क’ की सौगात मिलती है या नहीं
