पं मुकेश जोशी
दैनिक रेवांचल टाईम्स – युधिष्ठिरने पूछा- वैशाख मास के शुक्लपक्ष में किस नामकी एकादशी होती है ? उसका क्या फल होता है ? तथा उसके लिये कौन-सी विधि है ? भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने महर्षि वशिष्ठ से यही बात पूछी थी।वशिष्ठ जी ने बताया था तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। मनुष्य तुम्हारा नाम लेनेसे ही सब पापोंसे शुद्ध हो जाता है।
तथापि लोगोंके हितकी इच्छासे मैं पवित्रों में पवित्र उत्तम व्रत का वर्णन करूंगा। वैशाख मासके शुक्कपक्षमें जो एकादशी होती है, उसका नाम मोहिनी है। वह सब पापोंको हरनेवाली और उत्तम है। उसके ब्रतके प्रभावसे मनुष्य मोहजाल और सभी पाप मूहसे छुटकारा पा जाते हैं। सरस्वती नदीके रमणीय तटपर भद्रावती नामकी सुन्दर नगरी है। वहां ध्रुतिमान् नामक राजा, जो चन्द्रवंझ में उत्पन्न ओर सत्यप्रतिज्ञ थे, राज्य करते थे।
उसी नगर में एक वैद्य रहता था, जो धन-धान्यसे परिपूर्ण और समृद्धिशाली था। उसका नाम था धनपाल। वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था। दूसरों के लिए कुआं, मठ, बगीचा, पोखरा ओर घर बनवाया करता था। भगवान् श्रीविष्णुकी भक्तिमें उसका हार्दिक अनुराग था। वह सदा शान्त रहता था। उसके पांच पुत्र थे–सुमना, झुतिमान्, मेधावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि। धृष्टबुद्धि पांचवां था।
वह सदा बड़े-बड़े पापों में ही लगा रहता था। जुए आदि बुरे काम उसे अच्छे लगते । वह वेश्याओं से मिलने के लिए लालायित रहता था। उसकी बुद्धि न तो देवताओंके पूजन में लगती थी ओर न पितरों तथा ब्राह्मणों के सत्कार में। वह दुष्टात्मा अन्याय के मार्गपर चलकर पिताका धन बर्बाद किया करता था | एक दिन वह वेइ्याके गलेमें बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया ।
तब पिताने उसे घरसे निकाल दिया तथा भाईयों ने भी उसका परित्याग कर दिया। अब वह दिन-रात दुःख और शोकमें डूबा तथा कष्ट-पर-कष्ट उठाता हुआ इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन किसी पुण्यके उदय होनेसे वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रमपर जा पहुंचा। वैशाखका महीना था। तपोधन कौण्डिन्य गंगाजी में स्नान करके आये थे।
धृष्टबुद्धि शोकके भार से पीड़ित हो मुनिवर के पास गया और हाथ जोड़ सामने खड़ा होकर बोला- मुझपर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्यके प्रभाव से मेरी मुक्ति हो
कोण्डिन्य बोले–वैशाख के शुक्तपक्षमें मोहिनी नामसे प्रसिद्ध एकादशीका ब्रत करो । मोहिनीको उपवास करनेपर प्राणियोंके अनेक जन्मों के महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। वसिष्ठजी कहते हैं-श्रीरामचन्द्र मुनि का यह वचन सुनकर धृष्टबुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया। उसने कोण्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक मोहिनी एकादशीका ब्रत किया ।
इस ब्रतके करने से वह पाप से मुक्त हो गया और अंत में श्रीविष्णु धाम को चला गया। इस प्रकार यह मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत उत्तम है। इसके पढ़ने ओर सुनने से सहस्त्न गोदान का फल मिलता है।
पं मुकेश जोशी9425947692
