JDA में सिर्फ नाम का रिटायरमेंट! रिटायर्ड बाबू बन बैठे ठेकेदार – जारी है पद और प्रभाव का खेल’
दैनिक रेवाचाल टाइम्स जबलपुर
जबलपुर विकास प्राधिकरण (JDA) में कार्यरत कई कर्मचारी रिटायरमेंट के बाद भी अधिकारों और सेटअप का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने पद से रिटायर होने के बाद खुद को ‘ठेकेदार’ के रूप में पुनः स्थापित कर लिया है, और अब उन्हीं दफ्तरों में, उन्हीं लोगों के साथ, मनचाहा काम और ठेके उठा रहे हैं। इससे सवाल उठता है कि क्या जबलपुर विकास प्राधिकरण में नियम कानून सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं?
रिटायरमेंट के बाद भी JDA के गलियारों में घूमते हैं बाबू?
सूत्रों के अनुसार JDA के ऐसे कई पूर्व के कर्मचारी, जो विशेष रूप से क्लर्क, सुपरवाइज़र और जूनियर इंजीनियर स्तर के अधिकारी, रिटायरमेंट के बाद भी दफ्तर और दफ्तर के इर्दगिर्द दिखाई पड़ रहे हैं और कुछ तो नियमित रूप से देखे जाते हैं। कुछ मामलों में तो इन कर्मचारियों को टेबल व कुर्सी तक मुहैया कराई गई है। इनका असर ऐसा है कि वर्तमान अधिकारी भी कई बार इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते।

एक ही सेटअप, नया रोल – “बाबू से ठेकेदार”
जानकारी के अनुसार जांच में सामने आया है कि कुछ पूर्व कर्मचारी, जो पहले फाइलों को आगे बढ़वाने में माहिर थे, बाहर का माल अंदर करने वाले अधिकारी अब JDA के कामों के खुद ही ठेके लेने लगे हैं। इनके पास पहले से मौजूद नेटवर्क और प्रशासनिक जानकारी का भरपूर फायदा मिल रहा है।
इन बाबुओं ने सेवानिवृत्ति के बाद अपने संबंधों के दम पर खुद के नाम से या रिश्तेदारों के नाम पर फर्म रजिस्टर करवाई और अब अंदरूनी सांठगांठ से कार्यों के टेंडर अपने पक्ष में करवा रहे हैं।
नियमों की अनदेखी, अधिकारियों की चुप्पी आख़िर क्यों
वही JDA के प्रशासनिक नियमों के अनुसार, रिटायर्ड अधिकारी या कर्मचारी को किसी भी प्रकार की निर्णयात्मक भूमिका या आधिकारिक पहुँच नहीं दी जा सकती। लेकिन जबलपुर विकास प्राधिकरण कार्यालय जबलपुर (JDA) में यह नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। अधिकारी इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं। कई बार शिकायतें भी हुईं, लेकिन न जांच आगे बढ़ी और न कार्रवाई हुई। कहि इसके पीछे कोई बड़ा झोलझाल या फिर भ्रष्टाचार को छुपाने रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी से बैठाकर रिकार्ड सुधरवाया जाने की जानकारीया प्राप्त हो रही हैं

कहीं फायदे का सौदा तो नहीं?
आपको बता दे कि प्रशासन और उच्च अधिकारियों की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह सारा खेल मिलीभगत साठगांठ का नतीजा है? क्या सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जानबूझकर अंदर ही बनाए रखा गया है ताकि पुराने सिस्टम के जरिए नए फायदे उठाए जा सके और अपनी जेबें भरी रहे।
इस तरह की कार्यशैली ना केवल पारदर्शिता पर सवाल उठाती है बल्कि भ्रष्टाचार और उच्च अधिकारियों के पद का दुरुपयोग को भी बढ़ावा देती है। जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाली विकास योजनाओं का लाभ यदि कुछ चहेते लोग उठा रहे हैं, पर यह लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक का विषय है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जबलपुर विकास प्राधिकरण में रिटायरमेंट के बाद भी जारी है पद, प्रभाव और पहचान का दुरुपयोग। सवाल यही है।
“क्या JDA प्रशासन इस पर कार्रवाई करेगा? या खेल यूं ही चलता रहेगा यह ‘बाबू से ठेकेदार’ का खेल? और आती रहेगी अंदर की जानकारी बाहर और चलता रहेगा गुणा भाग का खेल यह देखना बाकी है कि इस सब के पीछे किन-किन जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारियों की भूमिका है यह तो जांच के बाद ही निकल कर सामने आ सकती हैं।
