जबलपुर के मुस्लिम इलाकों की रातें भी बड़ी दिलचस्प होती हैं। दिन ढलते ही मंडी मदार टेकरी, नई बस्ती, चार खंभा, रजा चौक, बड़ी मदार टेकरी, और बड़े कब्रिस्तान के सामने का इलाक़ा किसी छोटे-मोटे फ़ूड फ़ेस्टिवल में तब्दील हो जाता है। बिरयानी की ख़ुशबू, कबाब की महक, चाय की भाप, पान-सिगरेट की दुकानें और रंग-बिरंगी रोशनियां… ऐसा मंज़र कि शहर के बड़े-बड़े साहबान अपनी लाखों की गाड़ियों में तशरीफ़ ले आते हैं।
मगर हर रौनक का एक दुश्मन भी होता है।
किसी दिलजले ने थानेदार साहब के कान में फूंक मार दी
“हुज़ूर… बहुत भीड़ हो रही है।”
बस… फिर क्या था!
रात के सन्नाटे में थानेदार साहब अपनी फ़ोर्स के साथ ऐसे बरामद हुए, जैसे किसी बड़े गैंग का सफाया करने निकले हों। मगर वहां मिला क्या?
एक तरफ़ बिरयानी दम पर थी…
दूसरी तरफ़ कबाब सिक रहे थे…
तीसरी तरफ़ चाय उबल रही थी…
और चौथी तरफ़ जनता अपनी-अपनी गाड़ियों के सहारे मुल्क की अर्थव्यवस्था मज़बूत करने में लगी थी।
यहीं से शुरू हुआ “ऑपरेशन तशरीफ़”।
जो लोग “बनैटी” कला से नावाक़िफ़ हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह हमारी प्राचीन प्रशासनिक और पहलवानी कला है। इसमें बाना, चरखा, भर्रा आदि शाखा होती है। इसकी एक गोपनीय और विशिष्ट शाखा में लाठी को तक़रीबन 45 डिग्री के ज़ाविये पर उठाकर सीधे तशरीफ़ से संवाद स्थापित किया जाता है। थानेदार साहब ने इस विलुप्त होती कला का ऐसा शानदार मुज़ाहिरा किया कि देखने वालों को लगा कहीं पुलिस विभाग ने सांस्कृतिक मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार तो नहीं संभाल लिया।
अलबत्ता, एक कमी ज़रूर रह गई…
हमारे खेल और बनैटी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लाठी दो-चार डिग्री और ऊपर उठती तो प्रदर्शन को ओलंपिक में भेजा जा सकता था।
अब ज़रा इस पूरी दास्तान का सबसे दिलचस्प किरदार देखिए…
दुकानदार!
जनाब… उन पर तो जैसे किसी फ़िल्म का “नो एंट्री” बोर्ड लगा था।
बिरयानी वाले बिरयानी बेचते रहे…
कबाबी कबाब सेंकते रहे…
चाय वाले चाय उड़ेलते रहे…
पान वाले पान लगाते रहे…
और ग्राहक… लाठी खाते रहे।
यानी कारोबार भी चलता रहा और कार्रवाई भी।
अब हमारी अक़्ल इतनी ऊंची तो नहीं, मगर एक सवाल बार-बार ज़ेहन में कुलांचे मारता है…
अगर भीड़ दुकानों की वजह से थी…
तो फिर क्या… दुकानों का क़ुसूर नहीं था?
अगर शहद रहेगा तो मक्खियां आएंगी ही…
अगर गुड़ रहेगा तो चींटियां भी आएंगी…
मदारी होगा तो भीड़ होगी….
मगर यहां पूरा इंतज़ाम मक्खियां उड़ाने का था, गुड़ पर किसी ने नज़र-ए-करम तक नहीं डाली।
वैसे यह पहला मंज़र भी नहीं था।
एक रात पहले पुलिस का अमला पूरे अदब से आया। पूरे एहतराम के साथ कुछ गाड़ियों की हवा निकाली गई ताकि दुकानों के सामने रास्ता खुला रहे। दुकानदारों ने शुक्रिया अदा करते हुए चाय पेश की। पुलिस ने चाय नोशी फ़रमाई, घंटी बजाई और मुस्कुराते हुए रवाना हो गई।
दुकानें?
जनाब… वो तो पहले भी खुली थीं… बाद में भी खुली रहीं।
बस फ़र्क़ इतना था कि एक रात चाय पर ड्यूटी हुई…
और दूसरी रात लाठी पर।
इस पूरी कहानी से एक नई प्रशासनिक थ्योरी पैदा हुई है।
“दुकान खुली रहे तो कारोबार कहलाता है…
उसी दुकान के सामने भीड़ लग जाए तो जुर्म सिर्फ़ ग्राहक का होता है।”
वाह रे इंसाफ़!
गुड़ भी सलामत…
मक्खियां भी सबक़ सीख गईं…
और रात की बिरयानी भी ठंडी नहीं हुई।
अब शहर को अगली “शब-ए-बेंत” का इंतज़ार है। सुना है अगली बार शायद नई कला का प्रदर्शन होगा “दुकान भी खुली रहेगी, भीड़ भी हटेगी और सवाल पूछने वालों को समझाया जाएगा कि सवाल करना मुनासिब नहीं।”
बहरहाल… साहब की बनैटी कला से लाभान्वित हुए कुछ लाभार्थी, अपनी तशरीफ़ सहलाते हुए शायद दिल ही दिल में यह तराना गुनगुना रहे थे—
“सहेंगे तुम्हारा हर सितम हम खुशी से…
करेंगे न शिकवा कभी भी किसी से…”
उधर, जिन दुकानदारों की दुकानें बदस्तूर आबाद रहीं, उनके दिल से शायद यह नग़मा निकल रहा था—
“हमें जो तुम्हारा सहारा न मिलता…
भँवर में ही रहते, किनारा न मिलता…”
और हम… यानी इस तमाशे को दूर खड़े देखकर अपनी अक़्ल पर तरस खाते हुए बस यही सोच रहे हैं—
“जहाँ मुझ पे हँसता, खुशी मुझपे रोती…
अगर तुम न होते… अगर तुम न होते…”
क्योंकि उस रात एक अजीब-सा मंज़र था…
लाठी भी चल रही थी…
कारोबार भी चल रहा था…
ग्राहक भी पिट रहे थे…
और दुकानदार भी मुस्कुरा रहे थे।
यानी प्रशासन ने ऐसा नायाब फ़ॉर्मूला ईजाद कर लिया है जिसमें भीड़ भी गुनहगार है, मगर भीड़ की वजह बिल्कुल बेगुनाह!
इस फ़ॉर्मूले पर अगर पेटेंट हो गया, तो यक़ीन मानिए पूरी दुनिया पुलिसिंग सीखने जबलपुर आएगी।
मुहम्मद अनवार बाबू
स्थानीय संपादक, रेवांचल टाइम्स
बॉक्स-1
सवाल लाठी का नहीं, कानून के पैमाने का है
अगर आधी रात के बाद दुकानें खुली रखना नियमों के मुताबिक़ है तो फिर उन दुकानों के सामने खड़े लोगों पर लाठियां क्यों बरसीं? और अगर दुकानें नियमों के खिलाफ़ खुली थीं तो कार्रवाई सिर्फ़ ग्राहकों तक ही क्यों सीमित रही?
पूरी घटना में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानून का डंडा भीड़ पर चला, लेकिन भीड़ की वजह पर नहीं। बिरयानी पकती रही, कबाब सिकते रहे, चाय छलकती रही, दुकानें बदस्तूर चलती रहीं… बदल गया तो सिर्फ़ ग्राहकों का हाल।
कानून की निष्पक्षता का मतलब यही है कि कार्रवाई कारण पर हो, केवल परिणाम पर नहीं। वरना यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर कानून का तराज़ू एक तरफ़ ज़्यादा क्यों झुक जाता है?
बॉक्स-2
आख़िर इन दुकानों पर इतनी मेहरबानी क्यों?
यह कोई एक रात की कहानी नहीं है। शहर में चर्चा आम है कि देर रात तक खुली रहने वाली इन दुकानों के सामने अक्सर डायल-112 और पुलिस की गश्ती गाड़ियां खड़ी दिखाई देती हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पुलिस की मौजूदगी में सब कुछ हो रहा है, तो नियमों का पालन आखिर किससे कराया जा रहा है?
अगर यह माना जाता है कि इन जगहों पर देर रात असामाजिक तत्वों का जमावड़ा होता है और कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है, तो कार्रवाई का पहला निशाना उन कारणों को क्यों नहीं बनाया जाता जिनसे यह भीड़ पैदा होती है?
जनता जानना चाहती है कि क्या इन दुकानों को कोई विशेष छूट हासिल है, या फिर यह केवल अमल में ढिलाई का मामला है? जब तक इस पर स्पष्ट जवाब नहीं मिलेगा, तब तक सवाल उठते रहेंगे और संदेह भी बना रहेगा।
नोट बाइलाइन नाम फोटो के ठीक नीचे लिखना
