ठेकेदार, इंजीनियर और जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से सड़क पर डाका
रेवांचल टाइम्स नारायणगंज मंडला
प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में विकास की गंगा बहाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन नारायणगंज विकासखंड की ग्राम पंचायत अमदरा के पोषक ग्राम कुई में यह योजना भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। यहां 1 करोड़ 10 लाख रुपये की लागत से बनाई गई 2.5 किलोमीटर लंबी सड़क एक साल भी नहीं टिक सकी। सड़क की डामर परत जगह-जगह उखड़ गई है, गिट्टियां बाहर निकल आई हैं और करोड़ रुपये की लागत से बना मार्ग अब अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहा है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार सड़क निर्माण में भारी अनियमितताएं बरती गईं और गुणवत्ता को ताक पर रखकर केवल कागजों में मजबूत सड़क तैयार कर दी गई। हकीकत यह है कि जिस सड़क से वर्षों तक ग्रामीणों को राहत मिलने की उम्मीद थी, वह अब लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गई है।
जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री जनमन योजना के अंतर्गत ग्राम कुई में 2.5 किलोमीटर सड़क निर्माण का कार्य अर्नव बिल्डकॉन, अनूपपुर को दिया गया था। निर्माण कार्य की लागत लगभग 1.10 करोड़ रुपये बताई जा रही है। कार्य प्रारंभ 25 मार्च 2025 को हुआ और पूर्णता अवधि 24 मार्च 2026 निर्धारित थी। लेकिन सड़क की मौजूदा हालत देखकर ऐसा लगता है कि यह सड़क वर्षों पुरानी और उपेक्षित है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बनने के कुछ समय बाद ही उसकी परतें उखड़ने लगी थीं। कई स्थानों पर डामर पूरी तरह गायब हो चुका है और नीचे की गिट्टी खुलकर बाहर आ गई है। बरसात के पहले सड़क की पोल पूरी तरह खुल गई। लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य गुणवत्ता के साथ हुआ होता तो सड़क इतनी जल्दी जवाब नहीं देती।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि सड़क उखड़ने के बाद उसकी तकनीकी मरम्मत कराने के बजाय सीमेंट डालकर मामले को दबाने का प्रयास किया गया। ग्रामीणों के अनुसार जहां डामर उखड़ा, वहां सीमेंट डालकर खानापूर्ति कर दी गई ताकि पहली नजर में सड़क ठीक दिखाई दे। लोगों का सवाल है कि क्या यही करोड़ों रुपये के विकास कार्यों का स्तर है क्या विभाग को इतनी भी चिंता नहीं कि जनता के पैसे से बनी सड़क टिकाऊ हो। आरोप है कि सड़क निर्माण के दौरान अधिकारियों ने कभी गुणवत्ता की जांच नहीं की।
यदि जांच हुई होती तो घटिया निर्माण सामग्री और नियमों की अनदेखी सामने आ जाती। लोगों का कहना है कि बिना विभागीय संरक्षण के इतना बड़ा खेल संभव नहीं है। यही कारण है कि सड़क बनने के पहले साल में ही दम तोड़ गई और जिम्मेदार अधिकारी अब तक चुप्पी साधे बैठे हैं।
क्षेत्र में चर्चा है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता की जगह कागजी उपलब्धियों को प्राथमिकता दी गई। सड़क का भुगतान हो गया, फाइलें बंद हो गईं और जनता को उखड़ी हुई सड़क सौंप दी गई। अब जब सड़क की सच्चाई सामने आ रही है तो जिम्मेदार लोग जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जनमन योजना का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ना है, लेकिन यहां योजना को ही कमाई का जरिया बना दिया गया। करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद सड़क की यह हालत इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है। यदि निर्माण कार्य पूरी पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ हुआ होता तो सड़क इतनी जल्दी बिखर नहीं जाती।
लोगों ने सवाल उठाया है कि जब सड़क पर पांच वर्षों का संधारण प्रावधान है तो फिर सड़क उखड़ने के बाद ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई सड़क की गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं कराई गई। जिम्मेदार इंजीनियरों ने निर्माण कार्य को किस आधार पर प्रमाणित किया और सबसे बड़ा सवाल—यदि सड़क मानकों के अनुरूप बनी थी तो एक साल के भीतर उसकी ऐसी दुर्दशा कैसे हो गई।
ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल सड़क का मामला नहीं बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई से जुड़े करोड़ रुपये का मामला है। यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। लोगों ने मांग की है कि सड़क निर्माण की तकनीकी जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, निर्माण सामग्री के नमूनों की लैब जांच हो और दोषी पाए जाने पर ठेकेदार सहित जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
ग्राम कुई की यह सड़क अब विकास का प्रतीक नहीं बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल बन चुकी है। सड़क की उखड़ी परतें मानो चीख-चीखकर पूछ रही हैं कि आखिर 1 करोड़ 10 लाख रुपये की राशि खर्च होने के बाद भी सड़क इतनी जल्दी क्यों बिखर गई क्या यह महज लापरवाही है या फिर करोड़ रुपये के निर्माण कार्य में किसी बड़े खेल की आहट जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक ग्रामीणों के मन में एक ही बात गूंजती रहेगी—क्या जनमन योजना की सड़क पर विकास दौड़ा या भ्रष्टाचार।
