रेवांचल टाइम्स | मंडला जिले में अमृत सरोवर के बुरे हाल जिम्मेदार मालामाल योजना बेहाल लाखों करोडो के अमृत सरोवर में एक एक बूंद पानी के लिए तरसते ग्रामीण ये किसके लिए बनाई गई योजनाएं क्या विभाग और ठेकेदारों के लिये जो सरकार से मिलने वाली राशि को बंदरबांट कर केवल एक मेड नुमा बना कर पानी रोक अपनी पीठ थपथपाई जा रही है और ये सरोवर में हुए भ्रष्टाचार की जाँच आखिर करेगा कौन जो आज भी अधूरे पड़े है और जो बने है वह पानी रोकने में असफल साबित हो रहे है इन्हें पर ठेकेदारों ने कार्य किया जो कभी मजदूरी करते थे या फिर किसी पार्टी की कार्यालय में दरी उठाने का कार्य किया करते थे वह जैसे ही योजनाएं क्रियान्वयन हुई वह विभाग से गठबंधन कर ठेकेदार बन बैठे जो आज इन अमृत सरोवर में एक बूंद पानी रोकने में असफल साबित हो रहे है इसका जिम्मेदार कौन ठेकेदार या विभाग।
वही सरकार की केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत सरोवर योजना का उद्देश्य गांवों में जल संरक्षण को बढ़ावा देना, भूजल स्तर सुधारना और ग्रामीणों को जल संकट से राहत दिलाना था। लेकिन मंडला जिले के घुघरी क्षेत्र में इस योजना की जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई अमृत सरोवर आज सूखे पड़े हैं और ग्रामीण पानी के लिए भटकने को मजबूर हैं।
वही सरकारी रिकॉर्ड में जिन सरोवरों को सफल और पूर्ण बताया जा रहा है, वे धरातल पर अपनी उपयोगिता साबित करने में पूरी तरह विफल दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में ग्रामीणों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी जल संरक्षण का सपना क्यों अधूरा रह गया?
क्या अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से हुआ सरकारी धन का खेल?
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की अनदेखी की गई और जिम्मेदार विभागों ने केवल कागजी खानापूर्ति कर योजना को सफल घोषित कर दिया। लोगों का कहना है कि यदि सरोवरों का निर्माण तकनीकी मानकों के अनुसार किया गया होता तो उनमें वर्षा जल का पर्याप्त संचयन होता और गर्मी के दिनों में भी पानी उपलब्ध रहता।
क्षेत्र में चर्चा है कि ग्रामीण यांत्रिकी विभाग, संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के कारण करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अमृत सरोवर जनता के किसी काम नहीं आ रहे हैं। जिन संरचनाओं को जल संरक्षण का आधार बनना था, वे खुद पानी के लिए तरस रही हैं।
जनता पूछ रही है जवाब
कागजों में पूर्ण बताए गए अमृत सरोवर आखिर सूखे क्यों पड़े हैं?
निर्माण कार्य में गुणवत्ता और तकनीकी मानकों का पालन हुआ या नहीं?
करोड़ों रुपये की स्वीकृत राशि कहां और कैसे खर्च हुई?
कार्यों का भौतिक सत्यापन किस अधिकारी ने किया?
यदि योजना सफल है तो ग्रामीण आज भी जल संकट से क्यों जूझ रहे हैं?
क्या निर्माण एजेंसियों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी?
जल संकट के बीच टूटती उम्मीदें
गर्मी के मौसम में क्षेत्र के कई गांव पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अमृत सरोवरों से उन्हें बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि सरोवरों में पानी नहीं और गांवों में प्यास बढ़ती जा रही है। इससे योजना की उपयोगिता और कार्यान्वयन दोनों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग तेज
क्षेत्रवासियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि अमृत सरोवरों के निर्माण, स्वीकृत बजट, भुगतान, गुणवत्ता और वर्तमान स्थिति की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, इंजीनियरों, ठेकेदारों और संबंधित एजेंसियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि जनता के टैक्स का पैसा जवाबदेही के साथ खर्च हो सके।
जनता का सवाल
“जब करोड़ों रुपये खर्च हुए तो अमृत कहां गया? अमृत सरोवरों में पानी क्यों नहीं है? क्या सरकारी धन का अमृत केवल विभाग और ठेकेदारों तक सीमित रह गया?”
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस गंभीर मामले की जांच कर सच्चाई सामने लाता है या फिर करोड़ों रुपये की यह योजना सरकारी फाइलों में ही सफलता की कहानी बनी रहेगी।
